हो गई है अब गतिहीन जीवनशैली-स्क्रीनटाइम भी बढ़ गया

झाबुआ। संजय जैन-सह संपादक।  एक व्यक्ति जिसके शरीर में ब्लड प्रेशर 160-100  है और एक अन्य व्यक्ति जिसका बीपी 120-80  है। दोनों में फर्क इतना है कि जिसके बीपी 160-100 हो रहा है, उसमें रक्त का दबाव अधिक है। इससे रक्त वाहिकाओं में टूट फूट अधिक होती है। रक्त वाहिकाओं की यही टूट फूट शरीर में जटिलताएं जैसे हार्ट अटैक, ब्रेन स्ट्रोक, पैरालिसिस, गुर्दे खराब होना आदि पैदा करती है। बीपी जितना नियंत्रण में रहेगा यानी 120-80 के दायरे में रहेगा, ऐसी जटिलताओं की आशंका उतनी कम होगी। पहले लोगों की गतिशील जीवनशैली थी। पैदल चलना, मेहनत वाले काम करना और मोटा अनाज खाना लोगों की दिनचर्या का हिस्सा था। अब लोगों की गतिहीन जीवनशैली है। घंटों कम्प्यूटर पर काम करना,आवागमन के लिए वाहनों का प्रयोग,फास्ट व प्रोसेस्ड फूड का सेवन, तनाव आदि बढ़ गया है। इसलिए हृदय व शरीर के सभी अंगों पर असर पड़ता है। यही कारण है कि बदलती लाइफस्टाइल के चलते बीपी के पैरामीटर भी बदल गए।

हो गई है अब गतिहीन जीवनशैली-स्क्रीनटाइम भी बढ़ गया

किसी भी व्यक्ति का ब्लड प्रेशर इस बात पर निर्भर करता है कि रक्त वाहिकाओं पर खून का दबाव कितना है। यदि यह अधिक होता है तो हाई ब्लड प्रेशर यानी उच्च रक्तचाप की श्रेणी में आता है जिसे चिकित्सीय भाषा में हाइपरटेंशन कहा जाता है। वैसे स्वस्थ व्यक्ति का ब्लड प्रेशर 120-80 होता है। कुछ वर्ष पूर्व ब्लड प्रेशर के पैरामीटर अलग थे। चूंकि अब गतिहीन जीवनशैली हो गई है, स्क्रीनटाइम बढ़ गया है। खानपान में परिवर्तन आया है, जिससे बीपी पर भी असर पड़ता है। अब भी लोगों में ब्लड प्रेशर के पैरामीटर्स को लेकर संशय बना रहता है जिसे दूर किया जाना जरूरी है।

बीपी नियंत्रण 120-80 के दायरे में

एक व्यक्ति जिसके शरीर में ब्लड प्रेशर 160-100  है और एक अन्य व्यक्ति जिसका बीपी 120-80  है। दोनों में फर्क इतना है कि जिसके बीपी 160-100 हो रहा है, उसमें रक्त का दबाव अधिक है। इससे रक्त वाहिकाओं में टूट फूट अधिक होती है। रक्त वाहिकाओं की यही टूट फूट शरीर में जटिलताएं जैसे हार्ट अटैक, ब्रेन स्ट्रोक, पैरालिसिस, गुर्दे खराब होना आदि पैदा करती है। बीपी जितना नियंत्रण में रहेगा यानी 120-80 के दायरे में रहेगा, ऐसी जटिलताओं की आशंका उतनी कम होगी। पहले लोगों की गतिशील जीवनशैली थी। पैदल चलना, मेहनत वाले काम करना और मोटा अनाज खाना लोगों की दिनचर्या का हिस्सा था। अब लोगों की गतिहीन जीवनशैली है। घंटों कम्प्यूटर पर काम करना,आवागमन के लिए वाहनों का प्रयोग,फास्ट व प्रोसेस्ड फूड का सेवन, तनाव आदि बढ़ गया है। इसलिए हृदय व शरीर के सभी अंगों पर असर पड़ता है। यही कारण है कि बदलती लाइफस्टाइल के चलते बीपी के पैरामीटर भी बदल गए।

वाइट कॉलर बीपी

जब व्यक्ति डॉक्टर के पास जाता है तो यह बहुत सामान्य है कि उसका ब्लड प्रेशर थोड़ा बढ़ जाए, उसे वाइट कॉलर बीपी कहते हैं। इसलिए किसी एक रीडिंग के आधार पर व्यक्ति को दवा नहीं दी जाती। उसे लगातार मॉनिटर किया जाता है। पहले बीपी को लेकर इतनी जागरूकता नहीं थी,अब घरों में ब्लड प्रेशर जांचने की मशीनें हैं।

कोई एक संस्था तय नहीं करती

यदि ब्लड प्रेशर का पैरामीटर 120-80  के दायरे में रहता है तो उसे स्वस्थ माना जाता है। जहां तक बीपी के पैरामीटर तय करने की बात है तो इसे विश्व स्वास्थ्य संगठन ही नहीं, बल्कि यूरोपियन सोसायटी ऑफ  हाइपरटेंशन, अमेरिकन सोसायटी ऑफ  ब्लड प्रेशर और बहुत सी कार्डियोलॉजी सोसायटी हैं, जो समय के साथ आने वाले बदलावों और रिसर्च के आधार पर बीपी के पैरामीटर्स तय करती हैं। इसे चिकित्सा समुदाय द्वारा स्वीकृत गाइडलाइन के अनुसार अपडेट किया जाता है।

इस तरह से रखें सामान्य

-नमक का कंट्रोल लिमिट में सेवन करें। उसे बिल्कुल बंद न करें। यह भी शरीर के लिए जरूरी तत्व है।

-खानपान पर ध्यान दें। फास्ट और प्रोसेस्ड फूड का सेवन न करें।

-दिमाग को रिलैक्स रखें। तनाव से दूर रहें।

-नियमित योग-व्यायाम और वॉक करें।

-अपने चिकित्सक की सलाह के अनुसार दवा लें।

-अपनी मर्जी से दवा बंद न करें। चिकित्सक की सलाह जरूरी है। दवा लेने से बीपी नियंत्रण में आ जाता है, लेकिन बंद करने से यह फिर बढ़ जाता है।

-बीपी की दवा नियमित व तय समय पर ही लें।

दवा तब दी जाती है

कम से कम तीन दिन तक रीडिंग लेने और अलग-अलग समय पर रीडिंग लेने के बाद भी,यदि लगातार बीपी हाई आता है और उसमें भी दवा देने के लिए कई फैक्टर्स देखे जाते हैं। जैसे कि धड़कन की गति कितनी है,सांस का फूलना,चलने में कितनी दिक्कत होती है,पैरों में सूजन है या नहीं, यह सब देखने के बाद दवा दी जाती है। मरीज को घर पर बीपी मॉनिटर करने की सलाह देते हैं।

डॉ.एम किराड़- जिला अस्पताल, झाबुआ