बड़े-बड़े चढ़ावे तो सब के सामने लिए जाते है,लेकिन उसका हिसाब सभी के सामने क्यो नही रखते है ?-क्या बड़े बड़े चढ़ावे लेने वाले हकीकत में राशि जमा भी कराते है या नही ?-हार्दिक हुंडिया,आईजा
बड़े-बड़े चढ़ावे तो सब के सामने लिए जाते है,लेकिन उसका हिसाब सभी के सामने क्यो नही रखते है ?-क्या बड़े बड़े चढ़ावे लेने वाले हकीकत में राशि जमा भी कराते है या नही ?-हार्दिक हुंडिया,आईजा
झाबुआ/इंदौर। संजय जैन-सह संपादक। आपको बता दे कि धर्म जगत में बहुत समय पहले एक चर्चा चली थी कि किसी एक बड़े मंत्री ने एक साधु को कांबली ओढ़ाने का चढ़ावा लाखो रुपयों में लिया था,जो दुनिया से अभी हाल में परलोक भी सिधार गए है। कहा जाता है कि यह तो साधु और नेता की मिली भगत थी। हार्दिक हुंडिया का कहना है कि शायद साधु ने कहा कि तुम तो कांबली ओढ़ाने का चढ़ावा ले लेना,यह पैसा भरना भी नहीं पड़ेगा,क्योंकि यह कार्यक्रम तो खुले मैदान में हो रहा है,जिससे यह किसी संघ के अंतर्गत भी नही आता है। इसलिए कार्यक्रम किसी भी संघ का नहीं है,यह तो मेरे प्राइवेट ट्रस्ट का कार्यक्रम है। इसके पीछे की मंशा शायद यह थी कि नेता चढ़ावा लेगा तो उसकी जैन समाज में वाह वाही भी हो जायेगी,साथ ही अजैन नेता को जैन धर्म के प्रति कितना प्यार है,यह भी समाज जन को भी दिखेगा। गौरतलब है कि मंशा यह भी हो सकती है कि जैन समाज में उस साधु का वर्चस्व कुछ इस तरह से भी बढ़ जाएगा कि वे कितने बड़े साधु है,जो एक बहुत बड़े अजैन मिनिस्टर से कांबली ओढ़ाने का चढ़ावा तक दिलवा दिया। आज तक इस चढावे की राशि अदा की भी गयी है या नही ? यह बात तो आज तक भविष्य के गर्त में एक रहस्य ही है, क्योंकि अभी कुछ दिनों पहले ही वे बड़े मंत्री दुनिया को अलविदा भी कह गए।
लिया जाता है नाम, समाज में दानवीर या जैन रत्न के रूप मे
हार्दिक हुंडिया का कहना है कि जैन शासन के कई महोत्सव होते हैं,जिस में सभी चढ़ावे संघ के समक्ष ही बोले भी जाते है,फिर संघ के सामने महोत्सव का हिसाब क्यो नही रखा जाता है....? मजेदार बात तो यह कि इन दिनों एक नयी परिपाटी चल पड़ी है कि ट्रस्ट के ट्रस्टी मंच पर सबसे आगे बैठते है,फिर जब कोई भी चढ़ावा लेता भी है कि तो ऐसा प्रतीत होता है कि बोली उन्होंने ही ली हो। अक्सर मैंने आयोजनों में देखा ह ैकि संगीतकार गवैए को पहले से ही समझा दिया जाता है कि उसको किस- किसका नाम बार-बार बोलना है,साथ ही कुछ ऐसे लोग भी श्रोता के साथ बैठ जाते है जो बोली लगाकर चढ़ावे अधिक बड़ा देते है। क्योंकि उनको पता रहता है राशि तो उनको भरना ही नही है। इस तरह बोलिया बढ़ाकर बोलने की पिछे उनका एक ही मकसद रहता है कि ज़्यादा से ज़्यादा राशि उनके प्राइवेट ट्रस्ट में कैसे भी आ जाय। यह वे लोग है जो ट्रस्ट में ट्रस्टी है,इनको कम ब्याज और बिना लिखापढ़ी के काफी रुपया निजी इस्तेमाल हेतु मिल भी जाता है। साथ ही उनको मुख्य दूसरा बड़ा फायदा यह भी होता है कि वे समाज के कर्जदार होने के बावजूद भी,उनका नाम समाज में दानवीर या जैन रत्न के रूप में लिया जाता है।
हो धर्म की प्रभावना
हार्दिक हुंडिया की देश के तमाम जैन धर्म प्रेमियों से दोनो हाथ जोड़कर विनंती और अपील है कि निर्दोष भाव से और परमात्मा के आदर के साथ कई चढ़ावे लिये जाते है,तो उसका पूरा लेखा-जोखा भी समाज के सामने रखना चाहिए। धार्मिक आयोजनों में संगीतकार गवैया,प्रिंटर, टेंट, विधिकारक,बेंड,नृत्य मंडली,रसोइया, हाथी, रथ, घोड़ा,बग्घी, फोटो- वीडियो ग्राफर,मीडिया विज्ञापन,इवेंट मैनेजमेट और सोशियल मीडिया के प्रचार आदि पर कितना खर्च किया गया और उसके बाद समाज के खाते में कितनी कमाई आयी.....? इसका हिसाब भी समाज के समक्ष रखना चाहिए। सभी धर्म प्रेमी दानवीर और जैन रत्न का चढ़ावे लेने के पिछे सिर्फ की एक ही भावना रहती कि धर्म की प्रभावना हो। इसलिए सभी से मेरा निवेदन है कि रुपयों का सही जगह उपयोग हुआ भी है या नही इस पर अपना ध्यान आवश्यक रूप से रखे।

