पहले शिव के प्रिय रहे और अब मोहन के भी संकटमोचक हो गए,मनीष सिंह ! दांव एक तीर से दो शिकार वाला,सीपीआर होने का घोषित मतलब

झाबुआ/इंदौर। संजय जैन-सह संपादक।    मप्र के प्रमोटी अफसरों में मनीष सिंह एक मात्र बेमिसाल अफसर इसलिए कहे जा सकते हैं कि सरकार का मुखिया चाहे कोई भी रहे,जब संकट के बादल छाने लगते हैं तो वे ही संकट मोचक के रूप नजर आते हैं। सत्ता की बागडोर जिस दिन मोहन यादव के हाथ में आयी,उन्होंने पहली फुरसत में जिन अधिकारियों को बड़ी बेरहमी से हटाया था,उनमें पहला नाम तो मनीष सिंह का ही था। जनसंपर्क के साथ-साथ उन्हें मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन लिमिटेड के एमडी पद से भी हटा दिया गया था। फिर वे करीब आठ माह लूप लाइन में,बिना विभाग के अपर सचिव रहते राजनीति के समंदर के किनारे बैठ लहरें गिनते रहे। गौरतलब है कि बिना विभाग वाले अफसरों के प्रति,वल्लभ भवन के बाबू भी कहां रहमदिली दिखाते हैं?

दांव-एक तीर से दो शिकार वाला

सरकार को मार्गदर्शन देने वालों ने ही शायद मुख्यमंत्री मोहन यादव को ज्ञान दिया कि अधिकारी किसी व्यक्ति के नहीं बल्कि कुर्सी के प्रति ही वफादार होते हैं। आठ महीने के अंधियारे में हाउसिंग बोर्ड के एमडी वाली पहली किरण उनके लिये तिनके का सहारा बन गई और मुख्यधारा की तरफ  उन्हें धकेलती रही। इस विभाग के मंत्री कैलाश विजयवर्गीय होने से सरकार का यह दांव एक तीर से दो शिकार वाला है,ऐसा हमारा मानना है। तलवार की धार पर चलते हुए मनीष सिंह इस सफर को पूरा कर ही रहे थे कि सरकार को समझ आने लगा कि उनके नाम और काम के मुकाबले उनका यह दायित्व तो बहुत ही छोटा है,तब कही जाकर उन्हें परिवहन विभाग के अपर सचिव,मध्य प्रदेश राज्य सड़क परिवहन निगम का प्रबंध संचालक के साथ ही इंटर स्टेट ट्रांसपोर्ट अथारिटी भोपाल का कार्यपालन अधिकारी का अतिरिक्त प्रभार भी दे दिया गया। अब वे उसी जनसंपर्क आयुक्त के पद पर हैं,जहां से करीब सवा दो साल पहले उन्हें हटाया गया था या यह भी कह सकते हैं कि इतिहास अपने को दोहराता ही है।

सीपीआर होने का घोषित मतलब

सीपीआर होने का घोषित मतलब है यह है कि सीएम का ऐसा इमेज मेकर अधिकारी,जो हर रोज उनसे रूबरू संपर्क में रहता है। उनसे पहले दीपक सक्सेना इस पद पर बमुश्किल पांच महीने भी नहीं रहे,कहा जा सकता है कि वो इस पद की दैनंदिन चुनौतियों और सीएम हाउस की मंशा को वे समझ नहीं पाए,लेकिन उल्लेखनीय यह है कि यदि ऐसा होता तो,सीएम उन्हें सबसे कमाऊ आबकारी विभाग का आयुक्त बनाते ही नही। मनीष सिंह की तरह ही डॉ.सुदाम खाड़े भी शिवराज के प्रिय रहे,इस सरकार ने उन्हें भी कुछ वक्त सीपीआर बनाया और अब तो उन्हें सीएम ने अपने प्रभार वाले इंदौर का कमिश्नर भी बना रखा है,इसका मतलब तो यही है कि वह भी सक्सेना की तरह मोहन प्रिय ही हैं,ऐसा हमारा मानना है।

निरंतर बजने वाले फोन से दूरी

डॉ.खाड़े से पहले संदीप यादव सीपीआर रहे,लेकिन उनके बारे में यह आम शिकायत रही कि वे निरंतर बजने वाले फोन से दूरी ही बनाए रखते थे। जबकि जनसंपर्क के मुखिया होने का मतलब है लोगों की सुनना और सरकार के गुस्से वाली ठोस बर्फ  को मक्खन सा कर देना। दीपक सक्सेना के अल्प कार्यकाल का मुख्य एक कारण यह भी रहा।

पहले शिव के प्रिय रहे और अब मोहन के भी संकटमोचक हो गए !

आयुक्त जनसंपर्क का दायित्व मनीष सिंह ने ऐसे वक्त संभाला है,जब प्रदेश के 19 वें मुख्यमंत्री मोहन यादव के कार्यकाल के सिर्फ  दो साल ही शेष बचे हैं और उनके विरोधी भी सरकार की स्थिरता पर संकट को लेकर मनगढ़ंत प्रचार को हवा देने से बाज नहीं आ रहे हैं। सरकार महिला,किसान,गांव,युवा आदि के सपनों को पूरा करने के लिए जुटी हुई है किंतु सरकारी योजनाओं की सफलता को लेकर जनता में विश्वास का वातावरण नहीं बन पा रही है। निकट आते विधानसभा चुनाव में सीपीआर पर ही इमेज मेकिंग का दारोमदार है,ऐसे में मनीष सिंह को यह दायित्व सौंपना सिद्ध करता है कि वे पूर्व सीएम शिवराज सिंह की तरह इस सरकार के लिये भी संकटमोचक की भूमिका में रहेंगे।