दुआ सभागार में पिछली माह लगी थी, डॉ.शिखा घनघोरिया की फोटो प्रदर्शनी-पहले ही दिन अलग-अलग राज्यों की 62 में से 17 चिड़ियों पर सोल्ड की स्लिप हुई चस्पा,17 चिड़िया फुर्र हो गई
दुआ सभागार में पिछली माह लगी थी, डॉ.शिखा घनघोरिया की फोटो प्रदर्शनी-पहले ही दिन अलग-अलग राज्यों की 62 में से 17 चिड़ियों पर सोल्ड की स्लिप हुई चस्पा,17 चिड़िया फुर्र हो गई
पिता ने पहला कैमरा गिफ्ट किया,फिर तो शौक सिर चढ़ कर बोलने लगा
झाबुआ/इंदौर। संजय जैन-सह संपादक। आपको बता दे कि ऐसा वाकिया बहुत कम देखने मे आता है कि किसी कलाकार की पहली ही प्रदर्शनी लगे और पहले ही दिन 17 फोटो पर सोल्ड की स्लिप चस्पा हो जाए। प्रीतमलाल दुआ सभागृह में पिछले माह एमजीएम मेडिकल कॉलेज की डॉ.शिखा घनघोरिया-प्रो. ओंको पैथालॉजी के 62 चित्रों की बर्ड एग्जीबिशन में से पहले ही दिन 17 चिड़ियों फुर्र हो गयी थी। विधायक मनोज पटेल ने उद्घाटन करने के बाद चित्रों का अवलोकन किया था। हो सकता है कि मेडिकल कॉलेज के डीन डॉ. अरविंद घनघोरिया का प्रभाव रहा हो या बर्ड्स लवर की दिलचस्पी एक चौथाई चित्र सोल्ड होने की खुशी से डॉ.शिखा का चेहरा चमक गया था।
डॉ.शिखा के मेंटर हैं,वरिष्ठ फोटोग्राफर शंकर पाठक
पहले डॉ.शिखा ने श्रीराम चौहान की सलाह पर कैनन कंपनी का 800 एमएम का पहला कैमरा लिया था। उसीसे उन्होंने कैमरा पकड़ना और सब्जेक्ट पर फोकस करना सीखा था। फिर उन्हें डॉ.संजय खरे ने पाठक सर की क्लास ज्वाइन करने की सलाह दी,वहीं से डॉ.शिखा ने डिप्लोमा कोर्स किया है।
फोटोग्राफी का शौक, आखिर लगा कैसे
इस सवाल पर डॉ.शिखा का कहना था कि मेरे पिता-पूर्व मंत्री-गौरीशंकर शेजवार पक्षियों वाले कैलेंडर से फोटो काट-काट कर मुझसे फ्रेम करवाते थे। मैं लैंस से उन फोटो को बढ़ा कर के देखती थी,बस ऐसे ही दिलचस्पी बढ़ती गई। भोपाल मेडिकल कॉलेज में थी,तब पापा ने 36 रील वाला पहला कैमरा मुझे गिफ्ट किया था। अब तो मैं मिररलेस कैमरे से फोटोग्राफी कर रही हूं,लेकिन वो कैमरा अभी भी मैंने सहेज का रखा है। जब पापा मंत्री थे,उसी दौरान मुंबई के विख्यात डॉ.रमाकांत पांडा से मुलाकात हुई,वे भी फोटोग्राफी करते है। पिताजी ने उन्हें कान्हा किसली सहित मप्र के अन्य टूरिस्ट स्पॉट देखने के लिये आमंत्रित किया था,फिर तो डॉ.पांडा मप्र.के मुरीद ही हो गए।
बर्डस्- फोटोग्राफी,ध्यान और तपस्या जैसा
आपको बता दे कि बर्ड एग्जीबिशन में जो 62 फोटो लगाए गए थे,उन्हें डॉ.शिखा ने पिछले पांच साल के दौरान डॉ.अरविंद के साथ हर साल कार से हिमाचल, उत्तराखंड, गुजरात, मप्र,विंध्याचल, कर्नाटक,केरला,आंध्र प्रदेश आदि राज्यों की यात्रा के दौरान उन्होंने जंगलों में बर्डो को तलाश करके फोटो खींचे थे। दोनो ड्रायवर भी साथ इसलिये नहीं रखते क्योंकि वे दोनों ही ड्राइव करते थे। उल्लेखनीय है कि बर्डस् फोटोग्राफी इसलिये भी चुनौतीपूर्ण होता है कि इसमे धैर्य बेहद ही जरूरी है। यह एक तरह से तो ध्यान और तपस्या जैसा होता है। एंगल जमाते-जमाते हल्की सी आहट से ही परिंदा कब उड़ जाए कोई कह नहीं सकता...? कैमरा हाथ में रहते हुए भी,वे दोनों मौन साधना जैसे रहते थे।
बेटर हॉफ का मैं,बेस्ट ड्रायवर
पत्नी के इस शौक को लेकर डॉ.अरविंद घनघोरिया का कहना था कि चिकित्सा सेवा के साथ शिखा का यह शौक उन्हें सुकून देता है। मैं फोटोग्राफी में भले ही ज्यादा नहीं समझता, लेकिन जब भी दो महीने फोटोग्राफी का टूर रहता,तब बेटर हॉफ के लिये,मैं बेस्ट ड्राइवर की भूमिका में बेहद खुशी महसूस करता हूं। हमने एग्जीबिशन के लिए इंदौर को इसलिये ही चुना था कि हम दोनों यहां के ही मेडिकल कॉलेज में हैं और यह हमारी कर्मभूमि भी है,जिसका रिस्पॉन्स हमें अच्छा ही मिला। अब आने वाले दिनों में हमारी जन्मभूमि जबलपुर और भोपाल में भी हम बर्ड एग्जीबिशन लगाने की कोशिश करेंगे।

