संतों आप धन्ना सेठों का आतिथ्य स्वीकारिये जरूर,लेकिन तंग बस्तियों में भी तो जाइये,ज्ञान की गंगा बहाने हेतु
मजदूर कैसे आ सकते है,रोजी-रोटी छोड़ कर वैभवशाली पांडाल में.?

झाबुआ/इंदौर। संजय जैन-सह संपादक।   बीते कई सालों से कथा-प्रवचन-संगीत कार्यक्रमों के रूप में भी इंदौर अपनी विशेष पहचान बना चुका है। संत ज्ञानानंद जी के तीन दिनी  व्यस्त कार्यक्रम जिसमे जेल में कैदियों को प्रवचन,बाकी दिनों में सत्संग अवधि के बाद फलाने-ढिमाके उद्योगपति,मंत्री के यहां भोजन और रात्रि विश्राम वगैरह।

बिछे रहते हैं कारोबारी,रेड कारपेट की तरह

संत ज्ञानानंद जी से कोई हमारी नाराजगी नहीं,बाकी संतों की तरह उनके प्रति भी हमारा बेहद ही आदर भाव है। उनसे पहले भी कई संत-महामंडलेश्वर आते रहे हैं,इन संतों की विमानतल पर अगवानी से लेकर प्रस्थान करने तक चमचमाती गाड़िया लगी रहती है। एक तरह से तो कारोबारी रेड कारपेट की तरह बिछे रहते हैं। कारोबारियों को ऐसे सत्ता से सीधे तार जुड़े वालो संतों का आभामंडल तो कुछ ज्यादा ही सम्मोहित करता भी है।

गरीब गुरबों की तंग बस्तियों में भी एक घंटे का प्रोग्राम तय कर लेवे

गौरतलब है कि इतने संतों के आगमन के बाद भी किसी आयोजक से लेकर खुद संतों के मन में यह विचार क्यों नहीं आता है कि कभी गरीब गुरबों की तंग बस्तियों में भी एक घंटे का प्रोग्राम तय कर लिया जाय......? जिन धन्नासेठों के आमंत्रण पर वे आते हैं उनके खाते में तो 365 दिन संतों की चाकरी,व्यासपीठ की पूजा और यजमानी का दायित्व रहता ही है। संतों की सेवा-कथा-प्रवचन से भरे पेट वाले परिवारों पर संत संगति का ही प्रभाव रहता है कि वे अगले संत के आगमन की व्यवस्था में फिर से जुट जाते हैं।

मजदूर कैसे आ सकते है,रोजी-रोटी छोड़ कर वैभवशाली पांडाल में.?

सेवा-सुविधा की बारिश से तरबतर इन संतों को भगवान तक भी याद नहीं दिलाते है कि इंदौर की उन बस्तियों में भी वे रुख करें जहां के रहवासी सुबह मजदूर चौक में इकट्ठा हो जाते हैं और हाड़तोड़ मेहनत से मिली मजदूरी से आटा,तेल,सब्जी के साथ शाम को घर लौटते हैं। इन बस्तियों में सकारात्मक बदलाव के लिए विभिन्न संघों के कार्यकर्ता तो फिर भी अभियान चलाते हैं,लेकिन संतों से सदचर्चा,व्यासपीठ पूजन को पहुंचने वाले विभिन्न संघो के वरिष्ठ पदाधिकारियों की इतनी भी हिम्मत नहीं होती है कि गीता-भागवत की ज्ञान गंगा बहाने वाले,इन महापुरुषों से वे अनुरोध तक कर सके कि महाराज श्री एक घंटे का समय तंग बस्तियों के रहवासियों के लिए भी निकालें,वो सारे लोग रोजी-रोटी छोड़ कर वैभवशाली पांडाल में तो नहीं आ सकते है ना....?

जाना पड़ा था,गरीब सुदामा को ही कृष्ण द्वार

उल्लेखनीय है कि वैसे भी पुराणों में यह सच पहले ही बताया जा चुका है कि गरीब सुदामा को ही कृष्ण द्वार जाना पड़ा था,कृष्ण तो राजसी ठाठबाट छोड़ कर सुदामा की कुटिया तक गए ही नहीं।