मंत्री कैलाश विजयवर्गीय की कुंडली में,सितारों की टेढ़ी चाल तो नही ?-मित्रता और रिश्ते निभाना तो कोई,मंत्री विजयवर्गीय से ही सीखे

झाबुआ/इंदौर। संजय जैन-सह संपादक।  मंत्री कैलाश विजयवर्गीय के सितारों की चाल शायद कुछ टेढ़ी चलती लग रही है। पिछले दिनों अपने मित्र के यहां शोक के चलते उन्होंने दस दिनी राजकीय अवकाश लिया और भाई लोगों ने भी इसके कारण तलाशने में आकाश-पाताल एक कर दिया है। प्रधानमंत्री मोदी माताजी को मुखाग्नि देने के बाद दोबारा अपने राजकाज की जिम्मेदारी में वे जुट गए थे। मुख्यमंत्री डॉ.मोहन यादव भी पिता के निधन पश्चात तीन दिनी शोक की अनिवार्यता का पालन करते हुए उज्जैन से ही वे वीसी करते रहे। वही अग्रवाल ग्रुप वाले विनोद अग्रवाल की पत्नी नीना के निधन के पांचवें दिन क्रेडाई प्रॉपर्टी शो के उदघाटन समारोह में शामिल हो गए थे।

मित्रता और रिश्ते निभाना तो कोई,मंत्री विजयवर्गीय से ही सीखे

गौरतलब है कि अपने व्यावसायिक संबंधों के विश्वस्त साथी और पारिवारिक सदस्य केके गोयल की कैंसर पीड़ित पत्नी के निधन पर वे दस दिनी अवकाश पर चले गए। मित्र के प्रति अपना फर्ज पूरा करने के लिये उन्होंने अवकाश क्या ले लिया...? विरोधियों को तो भागीरथपुरा कांड के बाद फिर बाल की खाल निकालने का घर बैठे मौका मिल गया कि प्रभारी मंत्री के नाते भोजशाला विवाद के चलते बसंत पंचमी पर उन्हें धार रहना पड़ता, शायद इसलिये ये रास्ता निकाला है। यह वजह गिनाने वाले इतिहास भी याद दिलाते हैं कि एक बार जब उन्हें भोजशाला विवाद के चलते बसंत पंचमी पर धार की जिम्मेदारी सौंपी गई थी,तब अल्पसंख्यक वर्ग के 13 सदस्यों को उनकी देखरेख में नमाज अदा करने की व्यवस्था की गई थी। यह इतिहास बताने वाले यह भूल जाते हैं कि मंत्री विजयवर्गीय के इस सूझबूझ वाले निर्णय से धार में अशांति की लपटें नहीं उठ पाई थी।

सरकारी सूची में मंत्री का नाम था ही नहीं

इस दस दिनी अवकाश का एक और कारण जो गिनाया जा रहा है वह यह भी है कि प्रभारी मंत्री रहते उन्हें धार में झंडावंदन करने जाना तो पड़ता। पिछले साल का अनुभव उनके समर्थकों को भी भली भांति याद है,जब धार की अपेक्षा उन्हें सतना में सलामी लेने का आदेश जारी किए जाने पर खूब कानाफूसी हुई थी कि सीएम से टसल(मनमुटाव)के चलते यह निर्णय जो लिया गया था। वो तो मंत्री विजयवर्गीय ने दिल्ली तक अपनी नाराजगी जाहिर की थी,तो सतना वाला आदेश वापस लिया गया था। उल्लेखनीय है कि इस बार तो वैसे भी झंडा वंदन करने वाले मंत्रियों की सरकारी सूची में उनका नाम था ही नहीं। आपको बता दे कि अब जबकि वे विधिवतत दस दिनी अवकाश पर हैं तो उन्हें इससे कोई फर्क नहीं पड़ा है कि इंदौर और धार में किसे ध्वजवंदन के लिए अधिकृत किया गया था।  

मंत्री विजयवर्गीय की उपेक्षा और सत्ता के गलियारों की खामोशी

राजनीति में कई बार शब्द नहीं बोले जाते,बल्कि संकेत तो दिए जाते हैं। मंच पर उपस्थिति, कार्यक्रम सूची में नाम और सार्वजनिक आयोजनों में स्थान संकेत सत्ता के असली भाव बताते हैं। हालिया घटनाक्रम में मंत्री विजयवर्गीय को लेकर जो दृश्य उभरा है,वह केवल एक व्यक्ति की अनुपस्थिति ही नहीं हैं,बल्कि सत्ता के भीतर चल रही असहजता की ओर इशारा तो करता है। 26 जनवरी के झंडावंदन जैसे संवैधानिक और प्रतीकात्मक कार्यक्रम में एक वरिष्ठ मंत्री का नाम सूची में शामिल ना होना,साधारण प्रशासनिक चूक तो नहीं कहा जा सकता है। इस उपेक्षा के संकेत को राजनीति समझने वाले पंडित भलीभांति पढ़ ही लेते हैं। सवाल यह नहीं कि मंत्री विजयवर्गीय का नाम झंडावंदन की सूची में शामिल क्यों नही था ? बल्कि, सवाल यह है कि उन्हें अलग क्यों रखा गया ? ऐसे व्यक्ति की बार-बार उपेक्षा होना केवल व्यक्तिगत अपमान ही नहीं,बल्कि राजनीतिक मर्यादा का प्रश्न भी है।

होता है सबसे बड़ा संदेश व्यवहार बल्कि  भाषण नहीं 

लोकतंत्र में मतभेद स्वाभाविक हैं,पर मतभेद यदि सम्मानहीनता में बदल जाएँ,तो वह व्यवस्था को कमजोर करते हैं। वरिष्ठता,अनुभव और संघर्ष को नज़र अंदाज़ करना यह तात्कालिक सत्ता संतुलन को तो साध सकता है,पर दीर्घकाल में यह विश्वास के क्षरण का कारण भी बनता है,आज यह सवाल केवल मंत्री विजयवर्गीय का ही नहीं है। यह सवाल हर उस कार्यकर्ता का भी है,जिसने वर्षों तक निष्ठा के साथ संगठन को सींचा है। लोकतंत्र में जनता के लिए सबसे बड़ा संदेश भाषण नहीं बल्कि व्यवहार होता है,ऐसा हमारा मानना है।