श्रम विभाग बन ना जाये कही शर्म विभाग- जहां पर नियमानुसार बाल श्रमिक प्रतिबंधित का बैनर टगा लगा होता,वही बाल श्रमिक
श्रम विभाग बन ना जाये कही शर्म विभाग- जहां पर नियमानुसार बाल श्रमिक प्रतिबंधित का बैनर टगा लगा होता,वही बाल श्रमिक
छोटू जरा चाय ला-कहां है शासन- प्रशासन की योजनाएं - कहां खो गए सामाजिक संगठन???
झाबुआ। संजय जैन-सह संपादक। कहीं कं ही छोटु होटलों पर झूठे ग्लास धो रहे है,गैेरेजों पर गाड़ी की गंदी मेल साफ कर रहे है,रेस्टोरेंटों पर भोजन परोस रहे है तो कहीं शासकीय योजनाओं में हीं तगारी,फावड़ा उठाकर जमीन को खोद रहे है। नगर में अधिकतर जगह चाय की दुकानो पर अक्सर ऐ छोटू जरा चार कट चाय ला यह शब्द अक्सर सुनने में आता है । शहर व ग्रामीण क्षेत्र के स्कूलों के बच्चे आने वाले सांस्कृतिक कार्यक्रम के आयोजन में व्यस्त हैं,लेकिन इन सब से दूर कुछ बच्चे जिंदगी की कशमकश में लगे हैं। यह वो बच्चे हैं,जिन्हें बाल मजदूर कहकर पुकारा जाता है। नन्हें नागरिकों की परेशानियों,दिक्कतों व हालात पर केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा चलाई जा रही विभिन्न योजनाएं पूरी तरह से सिफ र नजर आ रही हैं।
बाल श्रमिक प्रतिबंधित
ये स्थिति है जिले में छोटे-छोटे बच्चों की, जिन्हें बालश्रमिक कहा जाता है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा 14 वर्ष तक की आयु के बच्चों से काम कराने पर प्रतिबंध है, फिर भी इस प्रतिबंध का जिले में कोई असर दिखाई नहीं पड़ता । वर्षों-महीनों से बच्चें होटलों, गेरैजो, रेस्टोरेंटों, शासकीय कार्य में कठिन से कठिन काम करते देखे जा रहे है, यह देखकर भी जिले का प्रशासन मौन है,आखिर क्यो ? और तो और बच्चों के हितो मे काम करने वाले सामाजिक संगठन जैसे बचपन बचाओ आंदोलन तथा बाल अधिकार मंच मौन क्यों है,समझ से परे है ? कलेक्टर नेहा मीना के जिले में आने के बाद से कई तरह की व्यवस्थाओं में सुधार तो आया है, लेकिन कलेक्टर का ध्यान जिले में कठोर परिश्रम करने वाले बच्चों पर नहीं जा रहा है।
कहां है शासन की योजनाएं ?
शासन द्वारा बाल श्रम को रोकने के लिए सर्व शिक्षा अभियान, निजी तौर पर पढ़ो और बढ़ो कार्यक्रम का आयोजन किया जा रहा है, ताकि शाला त्यागी बच्चों को शाला में भर्ती किया जा सके,उन्हें पढ़ाई के मायने बताए जा सके लेकिन यह योजना कारगर साबित हो रहीं है या नहीं, या योजना का सहीं ढ़ंग से अमल, प्रशासन अधिकारियों द्वारा किया जा रहा है या नहीं, इस ओर कलेक्टर का कोई ध्यान ही नहीं है। जिसके चलते योजनाओं में मिठाई अधिकारी चट कर रहे है। बाल श्रम जिले की ज्वलंत समस्या है। बाल श्रम केवल शहरी या नगरीय क्षेत्रों तक में ही नहीं हो रहा है,अपितु ग्रामीण क्षेत्रों में शासकीय योजनाओं के तहत होने वाले कार्यों में भी बच्चों से कार्य करवाया जा रहा है।
अधिकतर सामाजिक संगठन सिर्फ अखबारों में फोटो छाप राजनीति करते
इस जिले में बच्चों के हितों में कार्य करने वाले अनेक सस्ंथाये व सामाजिक संगठन संचालित है, किंतु जिले भर में बाल श्रमिकों से काम लिया जा रहा है। परंतु बडी-बडी बाते कर प्रशासन को गुमराह करने वाले ये सामाजिक संगठनों में से अधिकतर संगठन बच्चो के हितों की लडाई,लडते नजर नही आ रहे है बल्कि सिर्फ अखबारों में फोटु छाप राजनिती करते नजर आते है और उन्ही समाचारों की कटिंग से अधिकतर सामाजिक संगठन अपने संगठन की आड मे अपनी रोटियां सेंकने मे लगे है। अधिकतर संगठन बाल श्रमिक प्रतिबंध कानून के अंतर्गत कार्य करते हुए नजर नही आ रहा है।
बचपन इंसान की जिंदगी का सबसे हसीन पल
बचपन इंसान की जिंदगी का सबसे हसीन पल होता है,न किसी बात की चिंता और ना ही कोई जिम्मेदारी। बस हर समय अपनी मस्तियों में खोए रहना,खेलना-कूदना और शरारत करना,लेकिन सभी का बचपन ऐसा ही हो जरूरी तो नहीं। एक और विद्यालयों में सांस्कृतिक कार्यक्रम की तैयारियां अभी से शुरू कर दीं हैं। समाज की जिम्मेदारियों से दूर हंसते खेलते बच्चे सांस्कृतिक कार्यक्रम की तैयारी कर रहे हैं।
कानूनी भाषा में बाल मजदूर
दूसरी ओर वे बच्चे हैं,जिनके लिए नया वर्ष हो या कोई और दिन,उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता। क्योंकि यह वो बच्चे हैं तो सुबह से शाम तक जी तोड़ मेहनत कर अपना पेट भरते हैं। उन्हें भी खेलना-कूदना पसंद है,पढऩा भी चाहते हैं। लेकिन मजबूरी में मजदूरी की दलदल में ऐसे फंस गए हैं कि उन्हें निकलने का अब कोई रास्ता नजर ही नहीं आ रहा है। कोई भी बच्चा जिसकी उम्र 14 वर्ष से कम हो और वह जीविका के लिए काम करे उसे शासन कानूनी भाषा में बाल मजदूर कहते हैं। लेकिन गरीबी, लाचारी और कई बार माता-पिता की प्रताड़ना के चलते बच्चे बाल मजदूरी के इस दलदल में धंसते चले जाते हैं। बाल मजदूरी के मामले में देश सबसे आगे है। ऐसे बच्चे दुकानों,हाथ ठेला,होटलों,रेस्टोरेंट,भोजनालयों पर काम कर रहे हैं या फिर अपने परिवार का काम कर हाथ बटा रहे हैं।
होटलो,रेस्टोरेंट और दुकानों में बाल मजदूरों की संख्या अधिक
शहर में चाय की दुकानों,होटलों,रेस्टोरेंट,भोजनालयों,दुकानों पर बाल मजदूरों को काम पर लगाया जाता है। ऐसे में इन प्रतिष्ठानों के संचालकों द्वारा मामूली मासिक पगार देकर नाबालिगों को काम पर रखा जाता है और जी तोड मेहनत कराई जाती है और अगर कोई बाल मजदूर काम में किसी प्रकार की लापरवाही या फिर गलती करने पर वेतन में कटौती कर कर ली जाती है और उसे सजा भी दी जाती है,लेकिन आफत के मारे इन बाल मजदूरों को यह सब अपने पेट के लिए सहना पड़ता है।
क्यो नहीं करता श्रम विभाग कार्रवाई ?
जिले में बाल श्रम की दयनीय स्थिति को देखने के बावजूद भी श्रम विभाग का कार्रवाई नहीं करना कई प्रश्नों को खड़ा करता है। या तो श्रम विभाग के पदाधिकारी एवं निरीक्षकों की होटलों, रेस्टोरेंट, गैरेजों आदि व्यवसाईयों से महीना बंदी है या फिर विभाग अपने कार्य के प्रति लापरवाह है। महीनों-महीनों बीत जाते है, लेकिन श्रम विभाग कार्रवाई के लिए जिले में भ्रमण नहीं करता है। केवल कार्यालयों में बैठकर एवं बैठकों में जाकर ही विभाग के अधिकारियों द्वारा कागजी खानापूर्ति कर ली जाती है। मजेदार बात तो यह है कि जहा पर नियमानुसार बाल श्रमिक प्रतिबंधित का बैनर टगा लगा होता है,वही बाल श्रमिक बड़े ही आसानी से देखे भी जा सकते हैै। शायद इस बैनर के सहारे अधिकारी,इन्हे बचा तो नहीं ले जाते है ? यह जांच का विषय है।
क्यो नहीं दे रहे स्थानीय अधिकारी ध्यान?
केंद्र और प्रदेश सरकार द्वारा बाल मजदूरों के लिए कई योजनाएं बनाई गई और उनके संचालन के लिए भारी भरकम रुपए भी खर्च किए जा रहे हैं,लेकिन जिले के जिम्मेदार अधिकारी इस ओर कोई ध्यान ही नहीं देना चाहते हैं। जिससे रोज बे रोज,बाल मजदूरी में इजाफा हो रहा है और छोटे से लेकर बडे-बडे व्यापारी और प्रतिष्ठानों के संचालकों द्वारा नाबालिकों को बाल मजदूरी की दलदल में धकेला जा रहा है। बाल मजदूरों की इतनी अधिक संख्या होने का मुख्य कारण गरीबी है। गरीब बच्चे दो वक्त की रोटी कमाना चाहते हैं तब इन्हें बाल मजदूर का हवाला देकर कई जगह काम ही नहीं दिया जाता। सरकार ने बाल मजदूरी के खिलाफ कानून तो बना दिए,इसे अपराध भी घोषित कर दिया है, लेकिन इन बच्चों की कभी भी गंभीरता से सुध नहीं ली गई।
आम जनता का सहयोग जरूरी,ले जिम्मेदारी
बाल मजदूरी को जड़ से खत्म करने के लिए गरीबी का खात्मा जरूरी है। सरकार के साथ ही आम जनता की भी सहभागिता की आवश्यकता है। आर्थिक रूप से सक्षम व्यक्ति अगर ऐसे एक बच्चे की भी जिम्मेदारी लेने लगे तो,सारा परिदृश्य ही बदल सकता है। फिर कोई माता-पिता आमदनी के लिए बच्चों को मजदूरी के दलदल में नहीं धकेलेंगे।

