प्रशासन नहीं उठा रहा सार्थक कदम-रिमोल्ड टायर और कंडम बसों पर टिका है,यात्रियों का सफर-हो रहा है यात्रियों की जान से लगातार खिलवाड़ -कोई रोकने टोकने वाला नहीं

कही अफसरों और बस संचालकों की मिली भगत तों नहीं....?-ओवरलोड का खेल-52 सीटर बसों को 72 सीटर में बदला गया

झाबुआ। संजय जैन-सह संपादक।  रिमोल्ड टायरों के उपयोग के अलावा जिले में कई कंडम बसें भी संचालित हो रही हैं। जिन्हें देखकर साफ  पता चलता है कि यह दशकों पुरानी बसें हैं। देखने में आ रहा है कि इन बसों की पूरी बॉडी के कलपुर्जे जगह-जगह से ढीले हैं,कई की खिड़कियां टूटीं हुई हैं। बस के अंदर का फर्श भी काफी कमजोर है। ऐसी बसों में सफर करने वाले यात्रियों की जान से लगातार खिलवाड़ हो रहा है।

सबसे अधिक लोकल बसें रिमोल्ड टायरों पर दौड़ रहीं

रिमोल्ड टायरों पर दौडऩे वालीं जिले में सबसे अधिक लोकल बसें हैं,जो जिले के भीतर ही संचालित होती हैं। बसों में रिमोल्ड टायरों के उपयोग की बड़ी वजह रुपयों की बचत है। आमतौर पर एक-डेढ़ साल में बस का टायर घिस जाता है,ऐसे में फिर नए टायर की जरूरत होती है। चूंकि नए टायरों की कीमत 20 से 22 हजार रुपए से शुरू होती है। जबकि पुराने रिमोल्ड टायर कई गुना कम कीमत पर मिलते हैं,ऐसे में रिमोल्ड टायरों का खूब उपयोग होता है।

ओवरलोड का नया खेल, 52 सीटर बसों को 72 सीटर में बदला गया

अभी तक बसों में ओवरलोड को छतों और बसों के भीतर ठूंस-ठूंस कर भरी सवारियों को ही जाना जाता था। लेकिन अवैध ओवरलोड को एक नंबर में किस तरह बदला जा सकता है,यह बस संचालकों और परिवहन महकमे ने कर दिखाया है। जिन बसों में सीट पर बैठने पर घुटने सामने वाली सीट से टकराते हैं और हम घुटनों को पूरे सफर तक सिकोड़े रहते हैं,असल में यह ओवरलोड की बजह से ही है।

कही अफसरों और बस संचालकों की मिली भगत तों नहीं ?

ऐसा प्रतीत होता है कि अफसरों और बस संचालकों की मिली भगत से शायद 52 सीटर बसों को 72 सीटर में बदला गया है। जिसकी बजह से सीटों के बीच की जगह कम हो गई है। ये सवारियों के साथ तो धोखा तों है ही, कही इस नापाक गठजोड़ से लाखों का सरकारी राजस्व निजी जेबों में तों नहीं जा रहा है....? इस फर्जीवाड़े की जाँच जिम्मेदार अधिकारियो को करना चाहिए,ऐसा हमारा मानना है।  निर्धारित सीटों पर पास की गई बसों में सीटें कैसे बढ़ी....? ये सवाल सीधे तौर पर परिवहन विभाग की कार्यप्रणाली पर खड़े तो कर ही रहे है । यदि बसों की जांच की जाए तो,यथा स्थिति सामने आ जाएगी। बसों के कंडक्टर और ड्राइवर को खाकी पोशाक पहनना अनिवार्य है। लेकिन यहां एक भी बस चालक- परिचालक ड्रेस में नजर नहीं आता है, टिकट मांगने पर भी नहीं मिलता हैं।

गंभीरता से नहीं लिया

जिला मुख्यालय से रिमोल्ड टायरों के उपयोग के साथ कई कंडम बसें फर्राटे भर रही हैं। यहां तक कि पिछले बीते सालो में कंडम बसों से कई बड़ी दुर्घटनाएं सामने आ भी चुकी हैं, लेकिन जिम्मेदारों ने इसे गंभीरता से नहीं लिया। यात्रियों की सुरक्षा ताक पर रखकर संचालित कंडम बसों की जांच-पड़ताल कर उनके विरुद्ध कोई कार्रवाई नहीं की जा रही है। कार्रवाई के नाम पर वर्तमान में परिवहन विभाग का अमला छोटी-छोटी चालानी कार्रवाई कर खानापूर्ति करने में व्यस्त है।

जल्द ही जांच करेंगे

आपके माध्यम से मामला हमारे संज्ञान में आया है,जल्द ही हम बसों की जाँच करेंगे और कार्यवाही करंगे।

कृतिका मोहटा-आरटीओ