कैलाश जी इंदौर शहर ने कुंठा तो खूब देख ली,अब तो नए साल में इस्तीफा देने का साहस दिखाइये
कैलाश जी इंदौर शहर ने कुंठा तो खूब देख ली,अब तो नए साल में इस्तीफा देने का साहस दिखाइये
(घंटे) की गूंज कम नहीं होगी
झाबुआ/इंदौर। संजय जैन-सह संपादक। भागीरथपुरा कांड के अदृश्य दोषियों को तलाशने के लिए जांच समिति गठित हो गई है। इंदौर शहर ने पहले भी इसी तरह की घटनाओं, लोगों की अकाल मौत, गबन गंगा वाले मामलों में ताबड़तोड़ जांच समितियां गठित होते देखी हैं। लोग अब समझ भी चुके हैं कि सिर्फ और सिर्फ ऐसी जांच समितियां,उबलते गुस्से पर ठंडे पानी का ही काम करती हैं।
हम बात कर रहें हैं मंत्री कैलाश विजयवर्गीय की
डॉ. मोहन यादव के दो साल और शिवराज सिंह के 18 साल,इन बीस सालों में इंदौर शहर करीब-करीब हर सप्ताह,उनकी कुंठा कथा के दृश्य और संवादों का सार्वजनिक प्रदर्शन देखने का आदी भी हो चुका है। शहर की तीन पीढ़िया जानती हैं कि मंचों पर मजदूर के बेटे वाली टैग लाइन से राजनीति की शुरुआत करने वाले पार्षद पर,रामजी की कृपा ऐसी रही कि इनके साथ तक वाले भी करोड़पति-कुबेर होते चले गए।
हिसाब-किताब चुकता करने का बेहतर अवसर
भागीरथपुरा कांड की जांच में चाहे जितने दोषी सामने आएं,लेकिन जिस शहर ने इनको कंधे पर बैठाया,जब ये देश है वीर जवानों के इनके आह्वान पर कपड़ा मिल की झांकियों में झांझ- मंजीरे बजाए गए। आज उस शहर को इनसे यह सवाल पूछने का हक भी नही है कि इनकी ही विधानसभा के भागीरथपुरा वार्ड में इतना बड़ा कांड हुआ है,तो आप ने क्या किया....? लेकिन उन तीन-पांच- सात-दस-बारह जितने भी लोग बेवजह अकाल मौत का शिकार हो गए,उनकी आत्मा की शांति के लिए इनको नैतिक जिम्मेदारी स्वीकारने के साथ ही इस्तीफा देने का साहस दिखा कर सरकार को बता देना चाहिए था कि मेरी विधानसभा के मृतकों के लिए मैं मंत्री पद को (....) मारता हूं। सरकार के दो-चार लाख की मदद से ज्यादा की राहत राशि तो,वे अपने बिल्डर मित्रों से दिला ही सकते हैं। चाहे जितनी मदद कर दें लेकिन बद्दुओं का जो ज्वालामुखी फटा है, इससे बेहतर अवसर तो फिर शायद ही आए,ऐसा हमारा मानना है।
त्याग पर तो मौसा जी भी शायद पीठ नहीं थपथपाएंगे
मंत्री दो दिन सोए नहीं तो इनके इस त्याग पर तो मौसा जी भी शायद पीठ नहीं थपथपाएंगे। अब तो इनके पास आपदा में अवसर तलाशने वाले महामानव जी का अनुसरण करने का सुनहरा अवसर भी है। सब जानते हैं कि इनके मंत्री पद त्यागने की मात्र पेशकश से ही भाजपा की राजनीति में बवंडर आना तय है। फिर तो इनके कद में जो अकल्पनीय इजाफा होगा,उसे तो वो सारे परिवार भी अवश्य सराहेंगे,जो सहायता का चेक लेने से इंकार कर सरकार को अपने आक्रोश से अवगत करा रहे हैं।
मित्र दिग्विजय सिंह मंत्रणा ही कर लेवे
बहुत संभव है कि मंत्रिमंडल के फेरबदल में उन सारे अभूतपूर्व मंत्रियों को भूतपूर्व करने का मुहूर्त मलमास में ही निकल भी आए। यह बेहतर हो सकता है कि उससे पहले तो ही वे आत्मघाती कदम उठाने का दुस्साहस कर दिखाएं। इसी शहर में कभी दर्जनों लोग जहरीली शराब पीने से मर चुके हैं,वह कांड अब किसे याद है......? लोग कुछ वर्षों में तो भागीरथपुरा कांड भी चूहा कांड,पेंशन कांड,बेकाबू ट्रक कांड की तरह भूल ही जाएंगे। राजनीति का कुंड जो अभी जहरीले पानी के कारण सड़ांध मार रहा है,इसे भागीरथी प्रयास की तरह पवित्र गंगाजल बनाने के लिए माया-मोह से मुक्ति की एक छलांग लगाने का निर्णय लेने में मंत्री को हिचकिचाहट हो तो,वे अपने प्रिय मित्र दिग्विजय सिंह से मंत्रणा ही कर लेवे,ऐसा हमारा मानना है।
कटे हाथ वाले ठाकुर की भूमिका का बहाना बहुत हुआ
इंदौर शहर होमी दाजी से लेकर सुरेश सेठ तक को आज भी नहीं भूला है। भाजपा में ऐसे व्यक्तित्व का अभाव तो है,अब तक जो पार्टी में किसी ने भी नहीं किया उसे ही वे कर के दिखा देवे। यदि ऐसा वे करते है तो राष्ट्रीय राजनीति में अटल जी और लाल बहादुर शास्त्री जी के बाद नैतिकता के इतिहास में कम से कम एक पन्ना में इनके नाम का भी जुड सकता है। भविष्य में भी कुंठित ही होते रहना पड़ सकता है। सीएम के दौरे में भी इनके सुझावों की अनदेखी से भी इनको एक सबक मिला भी होगा। कटे हाथ वाले ठाकुर की भूमिका का बहाना बहुत हुआ,अब तो इनकी अकड़ का ग्रहण तो रमेश मेंदोला पर लगा हुआ है, इसे इन्हें समझ भी आ जाना चाहिए। शायद वे इस भ्रम में जी रहे हैं कि इंदौर की राजनीति समझने वालों को यह पता नहीं है कि कोई अधिकारी उनकी सुनता ही नहीं है।
(घंटे) की गूंज कम नहीं होगी
मंत्री को नये साल में कुछ नया करने की हिम्मत दिखाने की आवश्यकता है। इन के दुस्साहस से बल्ला कांड और भागीरथपुरा कांड सहित और जितने भी ज्ञात- अज्ञात कांड होंगे,सब शायद धुल जाएंगे। मात्र खेद प्रकट कर देने से (घंटे) की गूंज कम नहीं होगी,इस गूंज पर इनका साहस असरकारी भी हो सकता है। ,ऐसा हमारा मानना है कि अब इनके विरोधी भी इनका गुणगान करने में नहीं थकेंगे कि पत्रकारिता में अनुराग द्वारी की तरह ही कोई एक भाजपा में भी तो रीढ़ वाला निकला है।

