लगातार.......खबरों का हुआ त्वरित असर.. नई ग्रंथपाल हर्षिता डेविड ने कल सोमवार को संभाला पदभार....
लगातार.......खबरों का हुआ त्वरित असर..
नई ग्रंथपाल हर्षिता डेविड ने कल सोमवार को संभाला पदभार....
लगातार......दुआ सभागृह इंदौर- परामर्शदात्री समिति के सदस्य भी खुश नहीं थे,प्रभारी ग्रंथपाल लिली डाबर के रवैये से-अपना प्रभाव दर्शाने हर बार समिति सदस्यों को सूचित करना भूलती रहीं.....
खबरों का हुआ असर
झाबुआ/इंदौर।संजय जैन-सह संपादक।आपको बता दे कि इसी समाचार पत्र ने लगातार शनिवार 19 दिसम्बर को कमिश्नर डॉ.सुदाम खाड़े को रखा धोखे में फिर कल सोमवार को सांसद शंकर लालवानी का हुआ,दोहरा रवैया उजागर नामक शीर्षक से समाचारों को प्राथमिकता से प्रकाशित किया था। खबरों के प्रकाशन के बाद प्रशासन हरकत में आया और आयुक्त लोक शिक्षण शिल्पा गुप्ता ने आदेश जारी कर प्रभारी ग्रंथपाल लिली डाबर को इस पद से हटाकर प्राचार्य खजराना हायर सेकेंडरी स्कूल में पदस्थ कर दिया। उनकी जगह देवी अहिल्या केंद्रीय पुस्तकालय के क्षेत्रीय ग्रंथपाल के रिक्त पद पर जबलपुर से स्थानांतरित कर हर्षिता डेविड को नया ग्रंथपाल नियुक्त कर दिया। हर्षिता डेविड ने कल सोमवार को अपना पदभार भी ग्रहण कर लिया। आपको बता दे कि देवी अहिल्या केंद्रीय पुस्तकालय परामर्शदात्री समिति के सदस्य भी समिति की सचिव डाबर द्वारा समिति सदस्यों को विश्वास में लिए बगैर मनमाने निर्णय लेने से नाराज भी थे।
कमिश्नर सर के निर्देशों का पालन,मेरी प्राथमिकता......
पदस्थ की गई हर्षिता डेविड से फोन पर चर्चा में जब पूछा कि यह प्रचारित किए जाने में कितनी सच्चाई है कि,आप इंदौर ज्वाइन नहीं करना चाहती हैं....? उनका कहना था,जबलपुर केंद्रीय पुस्तकालय में 17 वर्ष से क्षेत्रीय ग्रंथपाल पद पर रहने से एक अटैचमेंट तो ही जाता है,लेकिन शासन ने तबादला किया है,तो उस आदेश का पालन करना ही है। यह कहना सही नहीं कि मैं ज्वाइन करना ही नहीं चाहती थी। आज मैंने अपना पदभार भी संभाल लिया है। । मेरी कोशिश रहेगी कि ग्रंथपाल लिली डाबर ने ग्रंथालय की बेहतरी के लिए जो कार्य किए हैं,उसे कायम रख सकूं। दुआ सभागृह संबंधी मामले में कुछ भी कहना उचित नहीं है क्योंकि मुझे कोई जानकारी नहीं है। समिति अध्यक्ष कमिश्नर सर के निर्देशों का पालन,मेरी प्राथमिकता है।
इसलिये नाराज थे, समिति के सदस्य...
दुआ सभागृह इंदौर के नवीनीकरण-सौंदर्यीकरण कार्य पूर्ण होने के बाद विधिवत शुभारंभ प्रक्रिया अपनाई नहीं गई थी। समिति सचिव लिली डाबर ने तो संभागायुक्त डॉ.सुदाम खाड़े के हाथों से शुभारंभ की रस्म भी पूर्ण करा ली थी.साथ में ग्रंथालय का स्टॉफ ही रहा था। एक समिति सदस्य का कहना था कि जब सांसद शंकर लालवानी यदि दिल्ली में थे,तो अन्य सदस्य तो इंदौर में ही थे,किसी को सूचना तक क्यों नहीं दी गयी....? एक अन्य सदस्य का कहना था कि परामर्शदात्री समिति के सदस्यों को आमंत्रित करने का मतलब तो तब होता,जब शुभारंभ समारोह में कमिश्नर के आसपास समिति के सदस्य रहते,ऐसे में सचिव का फोटो-प्रभाव नजर भी नहीं आया। यही नहीं, इससे पहले भी उन्होंने जानबूझकर ऐसा अक्षम्य कृत्य किया था। गौरतलब है कि चाहे तत्कालीन समिति अध्यक्ष.संभागायुक्त दीपक सिंह रहे हों या संजय दुबे ही,उनके हाथों जितने भी कार्यक्रमों की शुरुआत की गई,समिति सदस्यों की उपस्थिति को हर बार उनके द्वारा नजरअंदाज किया जाता रहा। जिसके पीछे उनकी यही मंशा थी कि शहर में यह मैसेज जाए कि सिर्फ समिति सचिव के कारण ही ग्रंथालय और दुआ सभागृह में काम हो रहे हैं,जबकि समस्त कार्यों में धनराशि आवंटन समिति अध्यक्ष की सिफारिश पर ही शासन द्वारा किया जाता है। समिति सदस्यों की किराया वृद्धि मामले में भी नाराजी इसलिये थी कि उन्हें विश्वास में लिए बगैर सारे निर्णय किए गए थे। उल्लेखनीय है कि शहर हित के कार्यों में धनराशि संबंधी सहयोग करने वाली संस्थाएं पीपीपी मॉडल जैसी योजनाओं में सहयोग क्यों करेंगी...? जब उनके द्वारा दिए आर्थिक सहयोग का मनमाना उपयोग किया जाएगा.......
दो करोड़ खर्च के बाद भी,सभागृह में सीटें तो वही की वही 120 ही..
इंदौर शहर का यह एकमात्र सस्ता सभागृह है जो शहर के मध्य में और पर्याप्त पार्किंग वाला था,लेकिन हाईकोर्ट द्वारा पार्किंग के लिये केंद्रीय ग्रंथालय वाली जमीन लेने के बाद दुआ सभागृह की पार्किंग स्पेस भी प्रभावित हुई है। नवीनीकरण के पहले भी इस सभागृह की दर्शक क्षमता 114+6 कुल 120 क्षमता वाली थी,दो करोड़ इतने भारी खर्च के बाद भी सभागृह में सीट तो एक भी नहीं बढाई,वही की वही 120 सीटें ही हैं। बेहतर होता कि इतनी राशि खर्च करने में कम से कम 50 कुर्सियों की वृद्धि का भी प्लान बनाया होता। गौरतलब है कि शहर की संस्थाओं के लिये यह एकमात्र किफायती सभागृह था। अब इसका किराया चार गुना बढ़ाने का तो मतलब है कि संस्थाएं,कलाकार अपना काम ही बंद कर दें। आश्चर्य जनक बात तो यह भी है कि इंदौर शहर के सांस्कृतिक वातावरण से जुड़े इस मामले में कोई जनप्रतिनिधि बोलने तक को तैयार भी नहीं है।

