देश का पहला बड़ा गांधीवादी आंदोलन, एक ही हल-नर्मदा का जल,57 साल पहले हुआ था
देश का पहला बड़ा गांधीवादी आंदोलन,एक ही हल-नर्मदा का जल,57 साल पहले हुआ था
इंदौर महापौर ने बता दिया सरकार के आगे हाथ फैलाए बिना भी,किये जा सकते हैं बड़े काम
झाबुआ/इंदौर। संजय जैन-सह संपादक। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से लेकर मुख्यमंत्री डॉ.मोहन यादव और नगरीय विकास मंत्री कैलाश विजयवर्गीय तक नगरीय निकायों को एकाधिक बार कहते रहे हैं कि नगरीय निकाय अपनी विकास योजनाओं के लिये केंद्र और राज्य के आगे हाथ फैलाने की अपेक्षा आय के स्त्रोत भी खुद खोजें। जलूद में स्थापित 60 मेगावाट वाला सोलर पॉवर प्लांट निश्चित तौर6 पर नगर निगम और महापौर पुष्य मित्र भार्गव को तारीफ भी दिलाएगा। बिना किसी नेता की लाइन छोटी किए बिना अपनी लाईन बड़ी कैसे की जा सकती है? राजनीति में काम करने वालों को महापौर के इस एक काम से ही सीख लेना चाहिए।
ग्रीन बांड योजना के जरिये धनराशि जुटाई
देश में सतत आठ बार स्वच्छता सर्वेक्षण में नंबर वन रहा,इंदौर नगर निगम सोलर प्लांट मामले में भी मप्र के बाकी नगरीय निकायों के लिए रोल मॉडल तो बन ही गया है। बजाय केंद्र और राज्य से इस काम के लिए आर्थिक मदद मांगने की अपेक्षा महापौर ने ग्रीन बांड योजना के जरिये धनराशि जुटाई थी। दो साल पहले जब ग्रीन बांड योजना की उन्होंने चर्चा की थी,तब विरोधियों ने इसे एक और हवाबाजी कह कर खिल्ली भी उड़ाई थी। अब जब सोलर पार्क का काम अंतिम चरण में है,तब जनवरी में इसके लोकार्पण पर महापौर की जय जयकार करने वालों का तांता लगना भी तय है। तत्कालीन निगमायुक्त मनीष सिंह और तब की महापौर मालिनी गौड़ जब दिल्ली में इंदौर नंबर वन बनने की पहली ट्राफी लेने गए थे,तब भी ऐसी ही प्रतिक्रिया रही थी कि सेटिंग का खेल है। एक के बाद एक जब नंबर वन का सिलसिला ही चल पड़ा तो लड्डू की मिठास से5 विरोधियों की बोलती बंद हो गई थी।
देश का पहला गांधीवादी आंदोलन, जिसके आगे सरकार को झुकना पड़ा और नर्मदा इंदौर आई
महापौर अब जब नर्मदा के चौथे चरण के काम पर लग गए हैं,तो आज की पीढ़ी को यह भी जान लेना चाहिए कि इंदौर में नर्मदा का जल लाने के लिए 57 साल पहले छावनी के आमसभा में नर्मदा मैया इंदौर चलो का नारा दिया गया था। यह नारा उस समय प्रकाश चंद सेठी और महापौर रह चुके नारायण प्रसाद शुक्ला ने दिया था। यह आंदोलन जल्द ही एक जन आंदोलन के रूप में लोगों के समक्ष उभरा,कई समाजसेवियो,पर्यावरणविदों,छात्रों, महिलाओं, आदिवासियों, किसानों तथा मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का एक संगठित समूह बना, जिन्होंने इसमें अपनी सहभागिता की। आखिरकार एक ही हल-नर्मदा का जल 45 दिनों तक चलने वाले इस सतत आंदोलन को सफलता मिली और नर्मदा के आगमन पर शहर के लोगों ने जीत का जश्न मनाया था।
पहाड़ को वाटर पाइपों से बांध कर ऊंचाई से,पानी नीचे लाया गया
नर्मदा लाओ आंदोलन से जुड़े रहे अभ्यास मंडल के पूर्व अध्यक्ष शिवाजी मोहिते ने कहना है किय 1969 में नर्मदा मैया इंदौर लाओ आंदोलन शुरु हुआ था,जो इंदौर की एकजुटता की मिसाल बना था। यह 45 दिन चला देश का पहला गांधीवादी आंदोलन था। तत्कालीन सीएम श्यामाचरण शुक्ला ने पहले मना कर दिया था, बाद में राजवाड़ा की आमसभा में नर्मदा इंदौर लाने की घोषणा की थी। उदघाटन समारोह में तब के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी दशहरा मैदान आए थे और इंदिरा गांधी जलूद के समारोह में शामिल हुई थीं। इंदौर में तत्कालीन इंजीनियर खन्ना और रघुवंशी की सूझबूझ ऐसी थी कि जलूद से इंदौर तक बीच में पड़ने वाले पहाड़ को एक तरह से वाटर पाइपों से बांध कर ऊंचाई से,पानी नीचे लाया गया। तत्कालीन केंद्रीयय मंत्री पीसी सेठी की केंद्रीय मंत्री एआर अंतुले से मित्रता के चलते सीमेंट और पाइप की किल्लत नहीं आई थी। अभ्यास मंडल मध्य भारत का ऐसा सामाजिक संगठन है,जिसने दशकों पहले जल के महत्व और भविष्य में शहर की जल की मांग को समझा।

