आसमान से टपके और खजूर में अटके- बिलबिला रहे हैं कॉपी-किताब निर्माता

झाबुआ/इंदौर। संजय जैन-सह संपादक।  सरकारी प्रचार तंत्र भले ही जीएसटी दरों को कम करने को देश में जीएसटी उत्सव का माहौल बना रही है,लेकिन हकीकत में कुछ व्यापारी खुश ही नहीं है। गौरतलब है कि कॉपी,नोटबुक्स और किताब निर्माताओं से तो किसी ने जानने की कोशिश ही नहीं की है कि 22 सितंबर से लागू जीएसटी की नई दरें उनका तनाव क्यों बढ़ा गया हैं....? निर्माता वर्ग की यह पीड़ा है कि सरकार ने बस घोषणा ही की है। जबकि सरकार ने हमारा कान तो पीछे से पकड़ कर जोर से दबा दिया है। यह तो आसमान से टपके और खजूर में अटके  वाली कहावत चरितार्थ हो रही है।

पुस्तक माफियाओं को कृष्ण गृह में डाल देना चाहिए

उल्लेखनीय है कि जब अलग-अलग राज्यों में वेट लगता था,तब मप्र में कापी,नोट बुक्स पर वेट ही नहीं था,किंतु  बाद में शुरु हो गया था। 2017 से कॉपी,किताब और नोटबुक पर 12 प्रतिशत जीएसटी लगने लगा था। अब 22 सितंबर से केंद्र सरकार ने कॉपी, नोटबुक और किताब को तो टैक्स फ्री कर दिया,लेकिन वही कवर,प्रिंटिग,बाइंडिंग,लेमिनेशन जैसे रॉ-मटेरियल पर,पहले जहा 12 फीसदी ही जीएसटी लगता था,जिसे निर्माता इतना जीएसटी लगाकर दुकानदार को बेच देता था। अब सरकार ने इस रॉ-मटेरियल पर जीएसटी की दर में 6 प्रतिशत की वृद्धि कर 12 से 18 प्रतिशत कर दी है। देश की प्रमुख कॉपी निर्माता कंपनी डोम्स, हिंदुस्तान पेंसिल्स और क्लासमेट ने एमआरपी तो कम कर दी,लेकिन थोक विक्रेताओं का डिस्काउंट भी कम कर दिया है। जिससे उपभोक्ता को तो राहत मिली ही है। पुस्तक माफियाओं को इससे तनिक भी तकलीफ  नही होनी चाहिए,क्योंकि कई गुना मुनाफे वाली अपनी सेटिंग वाले पुस्तक सेट को प्रतिबंध के बाद भी बेख़ौफ बेच ही रहे है। सरकार को इन पुस्तक माफियाओं को दबोच कर सीधे गैर जमानती धारा का प्रावधन कर,उन्हें कृष्ण गृह में डाल देना चाहिए,ऐसा हमारा मानना है।

कॉपी-किताब,अब 6 से 8 प्रतिशत महंगी हो जाएंगी

विक्रेताओं का कहना है पहले एमआरपी से 60 प्रतिशत डिस्काउंट मिलता था। अब एमआरपी कम करने पर डिस्काउंट कम हो गया है। किताबों पर जीएसटी जीरो परसेंट कर दिया गया है,लेकिन किताब के कागज पर जीएसटी 12 से बढ़ाकर अब 18 प्रतिशत कर दिया है। वही प्रिंटिग पर पहले 5 प्रतिशत जीएसटी लगता था, जो अब सीधे 18 प्रतिशत कर दिया गया है। इससे कॉपी-किताब की लागत 6से10 प्रतिशत तक बढ़ जाएगी।

ऐसे समझे जीएसटी का असर

-पहले निर्माता 60 रु. एमआरपी वाली रॉयल कॉपी-172 पेज,रिटेलर को 25 रु. में देते थे। रिटेलर उसे 35 से 40 रु. तक बेच देता था।

-75 से 80 रु. एमआरपी वाली ए-फोर कॉपी 172 पेज, रिटेलर को 38 से 40 में निर्माता से मिलती थी और वह उसे 60 रु. से अधिक तक में बेच देता था।

-निर्माता 160 रु. एमआरपी वाली स्पाइरल कॉपी 300 पेज, रिटेलर को 90 रु. में देते थे,जिसे वह उसे 120-130 रु. तक बेच देता था। व्यापारियों का कहना है कि अब इन सब पर 6 से 8 फीसद की वृद्धि होने का कारण सरकार द्वारा रॉ-मटेरियल पर राहत नहीं देना है।

जीएसटी आयुक्त से मिल कर परेशानी बताई

जीएसटी आयुक्त धनराजू एस से पेपर ट्रेड एसोसिएशन, इंदौर अभ्यास पुस्तिका संघ और पुस्तक प्रकाशक विक्रेता संघ के पदाधिकारी मिले थे। उनको ज्ञापन देकर अपनी समस्या बताई है। आयुक्त ने जीएसटी काउंसिल तक बात पहुंचाने का आश्वासन दिया है। अन्य शहरों के संगठनों ने भी केंद्रीय वित्त मंत्री के नाम ज्ञापन दिए हैं। आगे अब सभी सरकार के रुख का इंतजार कर रहे हैं।

यशभूषण जैन- अध्यक्ष,इंदौर पुस्तक विक्रेता संघ