दो नवजात शिशुओं की मौत का मामला- पेस्ट कंट्रोल के असल ठेकेदार को बचाने,पेटी कांट्रेक्टर पर कार्रवाई की तैयारी तेज
डीन और अधीक्षक पर एक्शन कौन लेगा ? - समीक्षा करना इनकी प्रशासनिक जिम्मेदारी
झाबुआ/इंदौर। संजय जैन-सह संपादक। एमवायएच चूहा कांड इंदौर के एमवायएच अस्पताल में नवजात शिशुओं के साथ हुई एक शर्मनाक घटना है,जिसमें चूहों ने दो नवजात शिशुओं के हाथ कुतर दिए थे। इस घटना के बाद चिकित्सा शिक्षकों ने प्रशासकीय विफलताओं के कारण डॉक्टरों पर की गई कार्रवाई पर आपत्ति जताई थी। घटना के बाद,अस्पताल में पेस्ट कंट्रोल कर रही कंपनी का कॉन्ट्रैक्ट रद्द कर दिया गया है और अस्पताल की व्यवस्था में सुधार की प्रक्रिया शुरू की गई है।
नोटिस का जवाब पेश करें
उच्च न्यायालय की इंदौर पीठ के न्यायमूर्ति विवेक रुसिया और न्यायमूर्ति जय कुमार पिल्लई ने इस मामले का स्वतः संज्ञान लिया। युगल पीठ ने इस मामले में प्रदेश के लोक स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग के प्रमुख सचिव-इंदौर के शासकीय महात्मा गांधी स्मृति चिकित्सा महाविद्यालय के अधिष्ठाता-डीन,इंदौर संभाग के आयुक्त- राजस्व,इंदौर के जिलाधिकारी और इंदौर के पुलिस आयुक्त को नोटिस जारी करके जवाब मांगा है। उच्च न्यायालय ने अतिरिक्त महाधिवक्ता को निर्देश दिया है कि वह मामले से जुड़ी पोस्टमार्टम रिपोर्ट की प्रतियों के साथ नोटिस का जवाब पेश करें।
बली का बकरा किसे बनाया जाए?
एमवायएच में चूहों ने दो नवजात शिशुओं के अंग कुतर दिए,तब होहल्ला तो खूब हुआ था,लेकिन राहुल गांधी का एक्स पर मैसेज वॉयरल होने के बाद तो इंदौर से भोपाल तक इस मामले में ऐसा करंट फैला कि अब उसमें एमजीएम मेडिकल कॉलेज डीन से लेकर एमवायएच अधीक्षक तक इस उधेड़बुन में लगे हुए हैं कि बली का बकरा किसे बनाया जाए? और अपने दायित्व की खामियों पर कैसे पर्दा डाला जाए?
चूहों को प्रशासनिक लापरवाही को कुतरने का मौका ही नहीं मिलता
मेडिकल कॉलेज के गलियारों में चर्चा आम है कि डीन ने अब तक जो भी प्रशासनिक अलर्टनेस के नाम पर कार्रवाई की है,वो अधिकतर तो अपने विरोधियों को ठिकाने लगाने वाली भी रही है। अस्पताल के कर्मचारी दबी जुबान से यह भी कहने से नहीं हिचकते कि ऐसी हवाबाजी की अपेक्षा डीन और अधीक्षक एमवायएच की मरीज हितैषी बातों पर एक्शन लेते तो,शायद चूहों को प्रशासनिक लापरवाही को कुतरने का मौका ही नहीं मिलता।
पेस्ट कंट्रोल के असल ठेकेदार को बचाने,पेटी कांट्रेक्टर पर कार्रवाई की तैयारी तेज
दो बच्चों की मौत के बाद पीएम रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं करना भी गलतियों पर पर्दा डालना माना जा रहा है। यही नहीं अब सारा ठीकरा पेस्ट कंट्रोल और सफाई व्यवस्था देखने वाली एजाइल कंपनी पर फोड़ने की प्लॉनिंग भी चल रही है,ताकि असली दोषी पाक-साफ बने रहें। मुख्यमंत्री के निर्देश के बाद गठित उच्च स्तरीय जाँच समिति ने मामले से जुड़े जितने लोगों के भी बयान लिए हैं,सब ने कारण एजाइल कंपनी द्वारा पेस्ट कंट्रोल नही करना ही बताया है। जानकारी तो यह भी है कि एजाइल कंपनी तो पेटी कांट्रेक्टर के रूप में अस्पताल में काम कर रही है। मूल ठेका तो हिंदुस्तान लेटेक्स लिमिटेड कंपनी,जो पहले कंडोम बनाती थी,का है जो अब एचएलएल लाइफकेयर लिमिटेड के नाम से जानी जाती है। भारत सरकार का एक मिनी रत्न सार्वजनिक क्षेत्र का उद्यम है,जो परिवार कल्याण और स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र में सक्रिय है। पूरे देश में अस्पतालों-मेडिकल कॉलेजों में सफाई-सुरक्षा से लेकर तमाम तरह के मेडिकल इक्विपमेंट की जरूरतें पूरी करना एचएलएल के ही जिम्मे है। इस कंपनी ने पेटी कांट्रेक्टर के रूप में एजाइल कंपनी को काम सौंप रखा है। शायद पेटी कांट्रेक्टर एजेंसी को निशाने पर लेकर मूल कंपनी को क्लीन चिट दी जा सकती है। एमजीएम मेडिकल कॉलेज-एमवायएच आदि में नियमित पेस्ट कंट्रोल हो रहा है या नहीं यह देखने की जिम्मेदारी डीन और अधीक्षक की ही रहती है,लेकिन इस संबंध में भोपाल से आई समिति ने भी गंभीरता नहीं दिखाई है।
पेस्ट कंट्रोल कार्य में ये हैं चुनौतियाँ
सामाजिक संगठन एवं आमजन द्वारा अस्पताल परिसर में भोजन बांटने की व्यवस्था,अस्पताल में कंडम सामग्री का इकठ्ठा होना,ओपीडी के कैंटीन के खुले कूड़े से चूहों का बढ़ना,अस्पताल की पुरानी इमारत होने से टूटी ड्रेनेज लाइन और ड्रेनेज कवर से चूहे ,अन्य जानवरो का बाहर निकलना,परिसर में चल रहे नवीन निर्माण कार्यों की फैली सामग्री में चूहों के लिए घर बन जाना और भोजनालय होने के बाद भी मरीजों के परिसर में परिजनों का भोजन करना आदि पेस्ट कंट्रोल के कार्य में चुनौतियाँ है।
समीक्षा करना डीन और अधीक्षक की प्रशासनिक जिम्मेदारी
तरुण राठी हेल्थ कमिश्नर के दौरे के बाद पूरे प्रकरण में डीन और अधीक्षक की लापरवाही पर,लीपापोती कर अस्पताल में चूहों को नियंत्रित करने में हुई प्रशासनिक विफलता को छिपाने की कोशिश की जा रही है। आउटसोर्स एजाइल कंपनी को जिम्मेदार मानते हुए ब्लैक लिस्ट कर ठेका निरस्त करने की अनुशंसा कर प्रकरण को दाखिल दफ्तर कर दिया जाए। जबकि नियमित पेस्ट कंट्रोल कराना,समीक्षा करना डीन और अधीक्षक की प्रशासनिक जिम्मेदारी भी है।
लापरवाही-यह नहीं किया डीन ने
-मेडिकल कॉलेज डीन द्वारा 2023 में किये गए अनुबंध की शर्तों के अनुसार आउटसोर्स एजेंसी के कार्यों की निरंतर समीक्षा, निगरानी और मूल्यांकन नहीं किया।
-अस्पतालों के निरीक्षण के दौरान पेस्ट कंट्रोल करने के निर्देश नही दिये।
-एजेंसी को भुगतान का अधिकार डीन के पास होने से बिना पेस्ट कंट्रोल के एजाइल कंपनी को प्रति माह 1.65 करोड़ कुल 11 करोड़ का भुगतान करते रहे ।
-अस्पताल में इकठ्ठा कबाड़ के निपटारे की स्वीकृति नही दी।
-भोजनशाला बन जाने के बाद भी परिजनों को परिसर में भोजन करने पर कोई रोक नहीं लगाई।
-एमवायएच कैंटीन से चूहों के आने-जाने के बाद भी कोई कार्यवाही नहीं की गई।
-अधीन सर्विस शाखा द्वारा पेस्ट कंट्रोल और आउटसोर्सिंग कार्य की समीक्षा नहीं की गई ।
-अस्पताल की पुरानी ड्रेनेज लाइन रिपेयर,खुले चैम्बर और अस्पताल परिसर में चूहों के बिलों को बंद करने के लिए रिनोवेशन कार्य की स्वीकृति नहीं दी।
-पीडियाट्रिक सर्जरी विभाग के डॉक्टरों और नर्सिंग स्टाफ द्वारा आईसीयू में चूहों के प्रकोप की लगातार शिकायत की गई,पर उस पर कोई कार्यवाही भी नहीं की।
-जिसका काम इलाज करना है,उन डॉक्टरों पर पेस्ट कंट्रोल कार्य संबंधी दी जिम्मेदारी दे दी।

