गले नहीं उतरा ऐसा सृजन-भूल चूक लेनी-देनी-आरक्षक संजय सांवरे का नेक काम-पौधे लगाते जाओ,पेड़ काटते जाओ

झाबुआ/इंदौर। संजय जैन-सह संपादक। शहर और जिला कांग्रेस अध्यक्ष-इंदौर पद के लिए जिस तरह घोषणा की गई उससे कई कार्यकर्ताओं को लगा है कि कांग्रेस नेतृत्व ने भी भाजपा से अप्रत्याशित नाम की तरह चौंकाना तो सीख ही लिया है। इंदौर जिला अध्यक्ष विपिन वानखेड़े की नियुक्त किसी के गले नहीं उतर रही है। नगर अध्यक्ष पद पर चिंटू चौकसे को लेकर भी यही प्रतिक्रिया है। अरविंद बागड़ी,अमन बजाज के नाम पर असहमत नेता भी यह कहने से बाज नहीं आ रहे हैं कि शहर में कांग्रेस का जो हाल है,ऐसे में अश्विन जोशी को बनाते तो सृजन को विसृजन कहने की नौबत नहीं आती। इन दोनों अध्यक्षों की अग्नि परीक्षा तो तभी भी हो गई थी,जब राजीव गांधी की पुण्यतिथि के कार्यक्रम में अधिकांश नेता नदारद थे। वक्त बताएगा चयन कितना कारगर है।

भूल चूक लेनी-देनी
कान्ह-सरस्वती इंदौर की दुर्दशा और जनप्रतिनिधियों की उदासीनता को लेकर दुर्वासा समान पर्यावरण प्रेमियों और अभ्यास मंडल को कुछ तो राहत मिली ही होगी,जब सुमित्रा महाजन ने सार्वजनिक रूप से माफी मांगी थी । लोकसभा स्पीकर के साथ आठ बार सांसद रही ताई,जब विभिन्न पदों की जिम्मेदारी से मुक्त हो गईं,तब ही सही उन्हें याद तो रहा कि इन नदियों के मामले में माफी तो मांग ही लूं। उनकी इस माफी ने भी भोपाल से दिल्ली तक हुंकार भरने वाले स्थानीय जनप्रतिनिधियों को भी कटघरे में खड़ा करने के साथ,माफी की पतली गली भी बता दी है कि नदी के उद्धार के लिए कुछ ना कर पाओ,कहीं सुनवाई न हो,तब ऐसे किसी प्रकृति संवाद में माफी मांग ले।

पौधे लगाते जाओ,पेड़ काटते जाओ
शहर इंदौर  के राजनेताओं का मिजाज भी कुछ अलग ही है। रहवासियों को समझ ही नहीं आता कि एक दिन में पौधारोपण का रिकार्ड बनानेए, मां के नाम बगिया बनाने का संकल्प लेने वाले जनप्रतिनिधियों के प्रकृति प्रेम पर तालियां कूटें या हुकमचंद मिल की जमीन को हजारों पेड़ से मुक्त करने की योजना का स्वागत करें। हर पौधारोपण समारोह में शामिल होने वाले उत्साही बच्चे भी गफलत में हैं कि कौनसे संस्कार को अपनाए?

आरक्षक संजय सांवरे का नेक काम
इंदौर पुलिस में क्विक रिस्पांस टीम में पदस्थ आरक्षक संजय सांवरे ड्यूटी से बचे वक्त में हर रविवार को लालबाग में मुक्ताकाशी पाठशाला में 60 से अधिक गरीब बच्चों को 9 साल से निशुल्क पढ़ा रहे हैं। यही नहीं,कई बच्चों की स्कूल फीस और पढ़ाई का खर्च उठाने में मदद करते हैं। पुलिस सेवा में तो 2018 में आए,लेकिन यह सेवा कार्य उससे भी दो साल पहले से कर रहे हैं। शुरुआत में सिर्फ  तीन बच्चे थे,अब दसवीं तक के 60 बच्चें हैं। इस कार्य में उनके कुछ मित्र भी उनका साथ देने लगे हैं। इस नेक काम की प्रेरणा भी उन्हें अपने ही बचपन से मिली है। उनके परिवार की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी। पढ़ाई के लिए पैसे जुटाना भी मुश्किल था,लेकिन संघर्षों के बीच पढ़कर,वे कॉन्स्टेबल बने। तभी उन्होंने निश्चय किया कि बस्ती के बच्चों को ऐसी कठिनाइयों से न गुजरना पड़े।