धारा165/ख को लेकर कलेक्टर के रुख से मच रहा हाहाकार,लोगों के अरमानों का खून और शासन को करोड़ों के राजस्व का चूना भी लग रहा

झाबुआ। संजय जैन-सह संपादक। कहावत मै चाहे ये करू मै चाहे वो करू मेरी मर्जी यह कहावत झाबुआ में चरितार्थ हो रही है । मातृ शक्ति कलेक्टर नेहा मीना का मप्र भू-राजस्व संहिता की धारा 165/ख के बारे मे कानून के विपरीत अपनी निजी राय बनाकर थोपने से सैकड़ो लोग पीड़ित और परेशान हो रहे है। मगर सरकार के अधिकारी इस समस्या पर ध्यान देने को तैयार ही नही है । अपनी पदस्थापना से लेकर आज तक के कार्यकाल मे,कलेक्टर ने कुछ एक मंजूरी ही दी है,लेकिन अब भी सैकड़ो लोग पीड़ित और परेशान हो रहे है,यहाँ तो ठीक कुछ लोग तो अनुमति के इंतजार में परलोक ही सिधार गए है।

धारा165/ख  कैसे बनी हुई है,जी का जंजाल?

मप.भू-राजस्व संहिता की धारा 165/ख-जिसमे गैर आदिवासी की परिवर्तित भूमि के क्रय-विक्रय की कलेक्टर से अनुमति लेनी होती है। यह क्रय-विक्रय करने वाले दोनों ही पक्ष व शासन के लिए गले की हड्डी साबित हो रही है। जिस आदिवासी समाज को ध्यान में रखकर यह धारा लागू की गई थी,उनको भी इससे कोई फायदा नहीं हो रहा है,उल्टे नुकसान ही हो रहा है। एक और तो इस धारा के कारण यह जिला विकासक्रम में पिछड़ रहा है.वही दूसरी और शासन को राजस्व की करोडो की हानि भी हो रही है।  इस धारा से गैर आदिवासियों की जमीन का हस्तांतरण कछुआ चाल से ही हो पा रहा है। जिसकी वजह कलेक्टर की अनुमति देने की कार्यशैली ही है। इसमें आवेदन कई विभागों को पार करते हुए कलेक्टर के पास पहुंचता है और प्रक्रिया काफी महँगी व थकाने भी वाली है।  जिससे भूमि लेने-देने वाले दोनों ही पक्ष अपने उद्देश्य में सफल नहीं हो पाते है।

खुद के राजस्व अमले की रिपोर्ट की भीअनदेखी

एक और धारा165/ख  व दूसरी और वर्तमान कलेक्टर की इस कार्यशैली से  जनता पीड़ित और परेशान हो रही है। एक तो करेला और उस पर भी नीम चढ़ा  की कहावत पुर्णत: चरितार्थ हो रही है। पटवारी,आरआई, तहसीलदार व सारी एजेंसिया शासन की ही है और इनके द्वारा तैयार रिपोर्ट पर कलेक्टर द्वारा आदेश न करना, उल्टा क्रय-विक्रय करने वाले को आरोपित करना कि तुम भू-माफिया हो काफी हास्यास्पद और कष्टदायक है। यह कौन से कानून में लिखा है कि एक भूमि का एक से अधिक बार लेन-देन नहीं हो सकता है...? कलेक्टर के इस रुख से मंजूरी के कई आवेदन लंबे समय से लंबित है, जिससे दोनों ही पक्षकारों में बेवजह विवाद और आर्थिक नुकसान हो रहा है।  इन सबसे ऊपर शासन को राजस्व की करोडो की हानि हो रही है।

इस तरह की परेशानी मे फंसे है लोग

धारा 165/ख  की मंजूरी ना मिलने से कई तरह की व्यावहारिक दिक्कतें आ रही है। मसलन किसी ने जमीन खरीदी का एग्रीमेंट दिखाकर रजिस्ट्री पर लोन लिया है जिसकी रजिस्ट्री नहीं हो पा रही है ,मगर उन्हें बैंक का ब्याज तो देना पड़ रहा है। किसी के एग्रीमेंट का टाइम ओवर हो गया,जिसकी वजह से उसकी टोकन मनी डूबने और जमीन हाथ से निकल जाने का खतरा बढ़ गया है। किसी ने बाजार से कर्ज उठाया तो,वह भी परेशान है। किसी की पावर ऑफ़  औटर्नी की मियाद ही खत्म हो गय, जिससे लोगो को काफी नुकसान होने की सम्भावना भी बढ गयी है। यहाँ तो ठीक,कुछ लोग तो अनुमति के इंतजार में परलोक ही सिधार गए है। शायद कलेक्टर को व्यवाहारिक धरातल का अहसास ही नही है।

शहरी इलाकों में भूमि बेचने के लिए कलेक्टर की अनुमति की जरूरत नहीं-हाई कोर्ट-जिले की जनता में हर्ष का माहौल

हाल ही में मप्र हाई कोर्ट इंदौर ने 22 अगस्त शुक्रवार को महत्वपूर्ण निर्णय दिया कि शहरी क्षेत्र में भूमि बेचने के लिए कलेक्टर की अनुमति की आवश्यकता नहीं है। इस आर्डर से जिले की जनता में हर्ष का माहौल है। याचिका की सुनवाई जस्टिस प्रणय वर्मा की एकल बेंच में हुई थी। कोर्ट ने निर्णय में आदेश दिए कि अनुसूचित क्षेत्र में स्थित भूमि,जो शहरी इलाके या नगर पालिका की सीमा में आती हो,उस भूमि को विक्रय करने के पूर्व मध्य प्रदेश भू-राजस्व संहिता की धारा 165-6 ख के अन्तर्गत कलेक्टर की अनुमति लेना अनिवार्य नहीं है। इस निर्णय के बाद प्रदेश में किसी को भी अपनी ऐसी भूमि बेचने के लिए आसानी होगी जो कि अनुसूचित क्षेत्र के शहरी इलाके में स्थित हो। याचिकाकर्ता द्वारा खरगोन शहर में शिवप्रिया रेसीडेंसी नाम से कॉलोनी विकसित की गई थी,जिसके कार्य पूर्णता प्रमाण पत्र में यह शर्त रखी गई थी कि हर प्लॉट विक्रय करने से पूर्व धारा 165-6ख के अन्तर्गत कलेक्टर की अनुज्ञा लेना अनिवार्य होगा।

सभी कलेक्टर अड़ियल रवैये से काफी परेशान औऱ त्रस्त आमजन

जब हमारी टीम ने इस आदेश के बाद लोगों से चर्चा की तो उन्होंने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि कलेक्टर आखिर चाहती क्या है...? वह ऐसा क्यों कर रही है...? यह तो वे ही बेहतर तरीके से जानती होगी। यदि वे इसके बारे में नहीं जानती,उनको इसके बारे में जानकर मंजूरी देना चाहिए,ना कि लोगों को वापस लौटा देना चाहिए। कुछ लोगो ने बताया कि हाल ही में मप्र हाई कोर्ट इंदौर ने महत्वपूर्ण निर्णय दिया है कि शहरी क्षेत्र में भूमि बेचने के लिए कलेक्टर की अनुमति की आवश्यकता नहीं है। इस आदेश के बाद हम सब काफी खुश हो गए है क्योंकि अब हमें ऐसा महसूस हो रहा है कि हमें कालापानी की सजा से मुक्ति मिल गयी  है। क्या कलेक्टर को इस आर्डर की जानकारी नहीं है...? अब तो कलेक्टर को अपनी कार्यशैली में बदलाव लाना ही होगा। अब आगे देखना है कि मातृ शक्ति कलेक्टर इस आदेश का पालन करवाती है या नही...?  हम मप्र हाइकोर्ट का तहे दिल से आभार प्रकट करते है। कुछ लोगो ने तो रोषपूर्वक कहा कि जनता त्रस्त हो रही है,उनको शायद इस बात से कोई फर्क ही नही पड़ता है। उनको पीड़ित और लाचार लोगो की हाय औऱ बद्दुआओं का तनिक भी अंदाजा ही नही है। 165/ख की अनुमति की प्रक्रिया जिस -जिस विभाग से गुजर कर आती है,उनके विभाग के साथ ही अन्य विभागों के भी बाबू से लेकर बड़े अधिकारी तक सभी कलेक्टर के इस अड़ियल रवैये से काफी परेशान औऱ त्रस्त है। बेचारे हमसे ज्यादा तो वे लोग परेशान औऱ त्रस्त है,उनका तो आये दिन कलेक्टर से पाला जो पड़ता है।