झाबुआ। संजय जैन-जिला ब्यूरो। शहर के बावन जिनालय स्थित पौषध भवन में कल संस्कारों पर प्रवचन देते हुए साध्वी अनुभव दृष्टा जी ने बताया कि मनुष्य के बचपन में मां उसकी प्रथम गुरु के रूप में मान्य की गई है। यदि मां अपने बच्चों में धार्मिक संस्कारों के बीजों का रोपण नहीं करती है, तो वह उसके लिए शत्रु तुल्य है। यदि बच्चे को आदर सम्मान करना नहीं सिखाती है, तो वह बच्चा वयस्क होकर आपका भी सम्मान नहीं करेगा। 

विद्या विनिमय शोभते, विद्या विनय के बिना सुशोभित नहीं होती है...                                        

ब्राह्मी एवं सुंदरी ने अपने जीवन में विद्या तो प्राप्त कर ली थी, लेकिन विनय गुण को नहीं अपनाया था। जिससे उन्हें बार-बार जन्म लेना पड़ा था। माता कभी-कभी कुमाता का भी व्यवहार इस कलयुग में करती है। एक मां अपने चार वर्ष के पुत्र एवं दो वर्ष की पुत्री के मध्य भेदभाव का व्यवहार करके अपने पक्षपाती होने का प्रमाण देती है। माता अपने पुत्र को प्रतिदिन एक गिलास दूध में सूखे मेवे को मिक्स कर पिलाती थी, लेकिन पुत्री को दूध नहीं देती थी। इस पर एक दिन पुत्र ने अपनी मां से इस व्यवहार के भेदभाव के रूप को स्पष्ट करने को कहा, तो मां ने कहा कि बेटी तो मेरे घर से विवाह के पश्चात उसके ससुराल चली जाएगी। थेली भी खाली कर देगी, लेकिन तू तो बेटा मेरे जीवन का सहारा है। कमा कर मुझे तथा पिता तथा स्वयं के परिवार का पालन पोषण करेगा। इस पर पुत्र प्रतिदिन अपने को प्राप्त दूध में से आधा गिलास दूध अपनी बहन को पिलाने लगा। कहने का तात्पर्य यह है कि पूर्व काल से चली आ रही भेदभाव की प्रवृत्ति को वर्तमान में भी स्त्री– पुरुष एक समान मान्य किया जाकर शासन पद्धति में नारी सशक्तिकरण एवं लाडली बहना योजना क्रियान्वित की जा रही है। व्याख्यान का संकलन अशोक कटारिया ने किया।                          

यह थे उपस्थित                      

मीडिया प्रभारी रिंकू रुनवाल और प्रवक्ता संजय जगावत ने बताया कि धर्म सभा में वरिष्ठ श्रावक हमीरमल कसवा, श्री संघ अध्यक्ष संजय मेहता, सुश्रावक धर्मचंद मेहता,इंदरमल संघवी, अंतिम जैन, महेंद्र कोठारी, सोहनलाल कोठारी, राजेंद्र रुनवाल, राजेंद्र मेहता, सुरेंद्र काठी, कमलेश कोठारी सहित आदि श्रावक श्राविकाएं उपस्थित थे।