ज़मीन विवाद में समझौता नहीं करने पर लबाना समाज के पंचों का फैसला- पूरे परिवार का सामाजिक कार्यों से किया बहिष्कार

झाबुआ। संजय जैन-सह संपादक।   जिले में एक पुरानी रूढ़िवादिता आज भी प्रचलन में होने का मामला सामने आया है। मामला व्यक्तिगत जमीन के विवाद से शुरू हुआ है,जो अब सामाजिक बहिष्कार तक पहुंच गया। पंचों ने हुकुम दिया कि परिवार या तो धर्म परिवर्तन करे या सामाजिक बहिष्कार का दंभ झेले। इस पुरानी दकियानूसी रूढ़िवादिता वाले पंचों के निर्णय से पीड़ित पक्ष ने अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा और संवैधानिक प्रदत अधिकारों का उपयोग करते हुए,इस हुकुम के विरुद्ध कानूनी कार्यवाही करने हेतु लिखित में शिकायत दर्ज करते हुए समाज के उपस्थित पंचों इत्यादि के विरुद्ध सख्त कार्रवाई की मांग की है ।

यह है मामला

जिले के राणापुर विकासखंड ग्राम टांडी के निवासी देवचंद पिता हरजी लबाना,प्रकाश पिता गरवर सिंह नायक और अन्य ने संयुक्त रूप से शिकायती पत्र आईजी पुलिस इंदौर के अलावा पुलिस अधीक्षक झाबुआ, अध्यक्ष मानव अधिकार आयोग भोपाल और थाना प्रभारी मेघनगर को दिया है। इसमें उल्लेख किया गया कि उनके परिवार की महिलाओं मथुरीबाई, सीताबाई , सवलीबाई,सजू बाई और दुर्गाबाई के नाम से दर्ज कृषि भूमि को लेकर लक्ष्मण उदयसिंह और शंकर के बीच विवाद लंबे समय से चला आ रहा है,यह मामला न्यायालय में भी विचाराधीन है। जिसमें प्रार्थी गणों ने मुकदमा दर्ज कराने वाली परिवार की महिलाओं से राजीनामे हेतु बातचीत की थी,लेकिन बात नहीं बनी। इस संबंध में लबाना नायक समाज के पंचों ने 17 अगस्त 2025 को ग्राम रम्भापुर के राम मंदिर में समाज की एक बैठक बुलाई,जिसमें विपक्षी राहुल ने इस भूमि के संबंध में प्रार्थीगण के विरुद्ध  प्रस्ताव रखा। बैठक में लोकेंद्र पिता नवल सिंह ख़तेड़िया निवासी भीम फलिया, कृष्णा सिंह पिता मोतीसिंह नायक निवासी छायन सेमल खेड़ी और रमेश पिता प्रेमसिंह लबाना निवासी भमोरी-जिला दाहोद आदि उपस्थित थे। उक्त मीटिंग में विपक्षी राहुल ने बताया गया कि हमारे बीच आपने जिन लोगों को समझौता करने हेतु मध्यस्थ बनाया था,उन लोगों ने हमारा समझौता नहीं करवाया । जिस पर विपक्षीगणों ने प्रार्थीगण को उक्त दिनांक की बैठक मेंकहा कि जब तक समझौता नहीं हो जाता,तब तक ये प्रार्थीगण मध्यस्थ समाज से बहिष्कृत रहेंगे। उक्त तथ्य की जानकारी बैठक में उपस्थित उपरोक्त लोगों ने प्रार्थीगण को बताई।

झेलना पड़ रही मानसिक ओर शारीरिक प्रताड़ना

उपरोक्त जानकारी के बाद प्रार्थी गण ने लिखित में अनुमति लेकर रविवार 24 अगस्त को समाज के पंचों से एक बैठक आहुत करने की अनुमति ली। बैठक में विपक्षी गणों ने  मात्र एक मत से प्रार्थी गण को समाज में दोबारा लेने हेतु उनका विरोध किया। अंतत: इस प्रकार से प्रार्थीगण को लबाना समाज से बहिष्कृत तो कर ही दिया साथ ही विपक्षीगणों ने धर्म परिवर्तन करने पर दबाव भी उन पर डाला जा रहा है। बहिष्कृत कर दिए जाने से अब वे कोई भी सामाजिक,शादी ब्याह या मौत मरण के कार्यक्रम में शामिल नहीं हो पाएंगे और न ही समाज,इनके उपरोक्त किसी भी कार्यक्रम में शरीक होंगे। पीड़ितों का कहना है कि इस बहिष्कार ने उनके सामान्य जीवन को संकट में डाल दिया है। समाज से अलग-थलग कर दिए जाने के चलते,उन्हें मानसिक ओर शारीरिक प्रताड़ना झेलना पड़ रही है ।

की गई इनके विरुद्ध शिकायत

प्राथीगणों ने शिकायत में इन लोगों को प्रतिवादी बनाया गया और इनके विरुद्ध कार्यवाही हेतु शिकायती आवेदन 29 अगस्त शुक्रवार को प्रस्तुत कर दिया है ।
1- राहुल पिता लक्ष्मण सिंह-निवासी छायन सेमल खेड़ी
2- रामसिंह पिता लालू निवासी-खच्चरटोड़ी
3-देवचंद पिता गोवर्धन- निवासी मातलेश्वर
4-उदय सिंह पिता दामा- निवासी मातलेश्वर
5-प्रफुल्ल पिता गोवर्धन- निवासी सजेली
6-नरसिंह पिता सुजान सिंह-निवासी बड़गुडलिया
7-सोहन पिता मोतीलाल- निवासी दाहोद
8-सुरेश पिता उदय सिंह-निवासी चंदवाणा, गुजरात
9-नरेश पिता देवी सिंह-निवासी चंदवाणा,गुजरात
10-गरवर सिंह पिता गोमा भाई-निवासी दाहोद, गुजरात
11-कमलेश पिता सुजान सिंह निवासी-रमगांव
12-शांतिलाल पिता रघुजी-निवासी टांडी, राणापुर

पीड़ितों की यह मांग

पीड़ित परिवार का स्पष्ट कहना है कि धर्म परिवर्तन के लिए दबाव बनाना और समाज से बहिष्कार करना उनके संवैधानिक अधिकारों का हनन करना है। इन्होंने मांग की है कि समाज के नाम पर अन्याय करने वाले दोषियों के विरुद्ध जल्द से जल्द कठोर कार्रवाई कर उन्हें न्याय दिलाया जाए।

सामाजिक बहिष्कार करने वालों के खिलाफ  कानूनी अधिकार

आपको बता दे कि महाराष्ट्र जैसे कुछ राज्यों में सामाजिक बहिष्कार को अपराध घोषित करने के लिए कानून हैं। दोषी पाए जाने पर कैद और जुर्माने का भी प्रावधान है। पीड़ित मजिस्ट्रेट के पास अपनी शिकायत दर्ज करा सकता है और मजिस्ट्रेट पुलिस को जांच करने और सुरक्षा प्रदान करने का निर्देश दे भी सकता है। हालांकि मध्य प्रदेश में सामाजिक बहिष्कार का शिकार होने पर स्थानीय पुलिस से संपर्क करना होता है और भारतीय दंड संहिता के तहत शिकायत दर्ज करानी होती है। इसके अतिरिक्त अपने अधिकारों के लिए वकीलों से सलाह भी ले सकते हैं।

कानूनी अधिकार

1- शिकायत दर्ज कराना
पुलिस के माध्यम से या सीधे प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट के पास शिकायत दर्ज करा सकते हैं।
2- पुलिस जांच
मजिस्ट्रेट पुलिस को जांच करने और पीड़ित को सुरक्षा प्रदान करने का निर्देश दे सकता है।
3- कानूनी कार्रवाई
महाराष्ट्र में सामाजिक बहिष्कार से लोगों का संरक्षण,रोकथाम, निषेध और दमन अधिनियम जैसे कानून हैं, जिनके तहत ऐसे अपराधों में शामिल लोगों को दंडित किया जा सकता है।
4- दंड
दोषी पाए जाने पर तीन साल तक की जेल या एक लाख रुपये तक का जुर्माना या दोनों से दंडित किया जा सकता है।

क्या है सामाजिक बहिष्कार?

किसी व्यक्ति को समाज से पूरी तरह से अलग कर देना,सार्वजनिक सेवाओं जैसे कुएं का पानी,मंदिर या सार्वजनिक स्थलों का उपयोग करने से रोकना,विवाह,अंतिम संस्कार या अन्य सामाजिक रीति-रिवाजों में भाग लेने से रोकना आदि शामिल हैं।

क्या करे ? सामाजिक बहिष्कृत करने पर

-सबसे पहले तो शांत रहें और किसी भी तरह के टकराव की स्थिति से बचें।
-जितना हो सके लोगों से बात करें और उनसे सहायता मांगें।
-स्थानीय पुलिस या किसी न्यायिक अधिकारी से संपर्क करें और कानूनी कार्रवाई करें।
-कानूनी सलाह के लिए, किसी वकील से बात करे।

भारतीय संविधान किसी भी व्यक्ति को सामाजिक बहिष्कार करने की अनुमति नहीं देता

इसके विपरीत,संविधान समानता के अधिकार-(अनुच्छेद 14)भेदभाव का निषेध,(अनुच्छेद 15)और अस्पृश्यता का उन्मूलन,(अनुच्छेद 17) के माध्यम से ऐसे कार्यों से बचाता है। जो व्यक्ति किसी पर सामाजिक बहिष्कार लागू करता है,उसे धारा 298 क के तहत दंडित किया जा सकता है,जिसमें कारावास और जुर्माना शामिल है।

सामाजिक बहिष्कार कानून

भारतीय दंड संहिता-धारा 298 क के अनुसार जो कोई भी किसी व्यक्ति पर सामाजिक बहिष्कार अधिरोपित करता है या कराने का कारण बनता है,उसे तीन साल तक की जेल या पांच लाख रुपये तक के जुर्माने से दंडित किया जा सकता है। संक्षेप में,भारतीय संविधान सामाजिक बहिष्कार के विरुद्ध सुरक्षा प्रदान करता है और ऐसे कार्यों को रोकने के लिए दंडनीय अपराध के रूप में भी मानता है।