मातृ शक्ति कलेक्टर से अंतत: बेचारे पालको की,लूट के चंगुल से मुक्त होने की आखिरी आस भी शायद टूट गयी 

झाबुआ/इंदौर। संजय जैन-सह संपादक।  स्कूल शिक्षा विभाग के नियमों के अनुसार किसी भी स्कूल को अगले शैक्षणिक सत्र में पढ़ाई जाने वाली किताबों की सूची सत्र से 90 दिन पहले तक सार्वजनिक करनी होती है। बावजूद इसके जिले में किसी भी निजी स्कूल ने तय समय पर पुस्तकों की सूची जारी नहीं की थ़ी। इसके बावजूद स्कूल शिक्षा विभाग के अधिकारी ने नया पाठ्यक्रम जारी करने वाले स्कूलों पर कोई कार्रवाई नहीं की थ़ी। पहली से तीसरी कक्षा के पूरे पुस्तकों के सेट ही 3 से 5 हजार रुपए में मिल थे,जबकि स्कूलों में राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के तहत एनसीईआरटी की पुस्तकें लागू कर दी गई थ़ी। इसके बावजूद भी अधिकांश स्कूल निजी पब्लिकेशन की मनमाने दाम वाली पुस्तकें चला दी। जिससे अभिभावकों को 3 से 5 हजार रुपए का खर्च आया रहा था। जिले में निजी स्कूल संचालकों की मनमानी का विरोध सोशल मीडिया पर भी शुरू  हो गया था।

जिला पूरी तरह फिसड्डी साबित हो गया

उल्लखनीय है कि लगातार खबरो के प्रकाशन के बाद प्रशासन ने सिर्फ  खाना पूर्ति हेतु तो नहीं जारी कर दिया था आदेश..? आदेश यह था कि निजी विद्यालयों द्वारा पाठ्यपुस्तकों, यूनिफार्म एवं अन्य शैक्षणिक सामग्री के क्रय हेतु पालकों पर अनुचित दबाव बनाने पर उनके विरूद्ध कार्यवाही की जाएगी। मजेदार बात तो पिछले 4 माह से हम प्रशासन का ध्यान ,नगर के सबसे प्रभावी पुस्तक माफिया गांधी स्टोर्स द्वारा की जा रही लूट,की खबरो से आकर्षित भी करते चले आ रहे है। सतत प्रकाशित खबरो में 18 मार्च मंगलवार को प्रकाशित खबर डीएओ ने नही मांगी सभी स्कूलों से जानकारी,लूट मचने खुला तो नहीं छोड़ दिया..? 19 मार्च बुधवार को प्रकाशित खबर-*15 दिन बाद शुरू होगा नया शिक्षण सत्र,माफियाओं को लूट मचाने के लिए खुला तो छोड़ नही देगा प्रशासन क्या.....? और शनिवार 12 अप्रैल को प्रकाशित खबर शिक्षा विभाग नहीं तय कर पाया पुस्तक मेले की तिथि,70 प्रतिशत बच्चे खरीद चुके कोर्स...... नए शिक्षण सत्र को शुरू होने को 4 माह बीतने आ चूका है,क्या प्रशासन अब इतने दिनों बाद अपनी चिर निंद्रा से जागेगा ....?  उल्लेखनीय है कि उक्त निर्देश कही आनन फानन में मात्र औपचारिकता हेतु तो जारी नहीं कर दिया था..? वो भी तब,जब नए शिक्षण सत्र को प्रारंभ हुए 1 माह हो गया था। क्या प्रशासन को इतना भी पता नहीं था कि इस प्रभावी पुस्तक माफिया ने तब तक तो अपने लूट का खेल पूरी तरह से खेल लिया होगा...? और पीड़ित पालकों की गाढ़ी कमाई पर पुस्तक एवं स्कूल माफिया डाका भी डाल चुका था। इस मामले में तो शायद हमारा जिला पूरी तरह फिसड्डी साबित हो गया है,ऐसा हमारा मानना है।

मातृ शक्ति कलेक्टर को रखनी थी,अपनी निगाहे पैनी

कलेक्टर नेहा मीना के आदेशानुसार मध्यप्रदेश शासन स्कूल शिक्षा विभाग मंत्रालय वल्लभ भवन भोपाल द्वारा निजी विद्यालयों द्वारा पाठ्यपुस्तकों, यूनिफार्म एवं अन्य शैक्षणिक सामग्री के क्रय हेतु पालकों पर अनुचित दबाव बनाने जाने पर उनके विरुद्ध कार्यवाही के संबंध में निर्देश जारी किये थे । उक्त निर्देश के अनुक्रम में जिले में संचालित मान्यता प्राप्त संस्थाएँ-सीबीएसई विद्यालयों के निरीक्षण हेतु दलों का गठन किया गया था। उल्लखनीय है कि हर साल परंपरा अनुसार ऊपरोक्त तमाम निर्देश तो जारी कर दिए जात है,लेकिन यह निर्देश हर साल की तरह क ही फाइलों की शोभा बढ़ाने हेतु तो नही दे दिए जाते है....? आपको ज्ञात हो कि हर साल खबरों का प्रकाशन होता है,फिर ही प्रशासन हरकत में आता है और सिर्फ  कॉपी पेस्ट वाला निर्देश ही जारी कर,अपने वातानुकूलित कक्ष में कुंडली मार कर चिर निद्रा में सो जाता है। यही मात्र निर्देशो वाली प्रशासन की परिपाटी पालक सालों से देखते तो चले आ ही रहे है,साथ ही पुस्तक एवं स्कूल माफियाओं द्वारा लुटते भी चले आ रहे है,जिनकी पीड़ा हर साल की तरह इस साल भी कोई दूर कर नही पाया। मातृ शक्ति कलेक्टर को इस निर्देश का परिपालन हेतु जमीनी स्तर पर उतरना था,साथ ही इस मामले में नियमित रूप से अपनी पैनी निगाहे संबधित विभाग के द्वारा की गयी कार्यवाही पर रखनी थ़ी,साथ हो लापरवाहों पर तुरंत निलंबन की कार्यवाही करने की आवश्यकता थ़ी,तब सही माने उपरोक्त निर्देशों का कोई औचित्य होता,ऐसा हमारा मानना है।                       

मुझे कोई फर्क नही पड़ता-अंतत: बेचारे लाचार पालकों की आखरी आस भी शायद टूट गयी

पाठ्यक्रम में हो रही लूटपाट पर जब हमारी टीम ने परेशान अभिवावकों से चर्चा की थ़ी,तो अधिकतर लोगों ने कहा था कि हम हर साल बच्चो के भविष्य के चलते इस पाठ्यक्रम माफियाओं के शिकार होते चले आ रहे है। सिर्फ इक्का-दुक्का कलेक्टर को छोड़कर, इनके चुंगल से हमे आज तक कोई भी इस लूट खसोट से हमे बचा नही पाया है। कुछ अभिवावकों ने रोषपूर्वक हमे बताया था कि कलेक्टर को तो सिर्फ  नगर के प्रभावी एक मात्र सबसे बड़े पाठ्यक्रम माफिया गांधी स्टोर्स (राजकुमार गांधी) को अपने चुगंल में ले लेती,तो सारे दूसरे सभी छोटे मोटे माफिया स्वत: ही भूमिगत हो जाते,ऐसा हमारा पूरा विश्वास है। प्रशासन कहता है कि लिखित में शिकायत देवे ,जो सम्भव नही है क्योंकि हमारे बच्चों के साथ आगे क्या व्यवहार ये माफिया,इनके साथी स्कूलों की मिलीभगत से करेंगे ? यह हम भली भाती से जानते भी है। मजेदार तो हमने हमारी पूर्व की खबरो में नगर के सबसे प्रभावी पुस्तक माफिया गांधी स्टोर्स द्वारा बेख़ौफ  लूट की जा रही है,उसका उल्लेख भी किया था। इस बारे में पीड़ित पालको ने हमे नामजद बताया था कि इस पुस्तक माफिया ने बेख़ौब और खुले आम लूट का तांडव मचा रखा है,जिसकी ओर कोई भी देखनेवाला ही नही है। कुछ लोगो ने कहा था कि हमने सुना है कि अभी की मातृ शक्ति कलेक्टर किसी भी माफिया को अपने आसपास फटकने तक नही देती है। प्रशासन कहता है कि आप शिकायत करे,जबकि पिछले माह खुले आम लूट करने वाले पुस्तक माफिया की नामजद खबरे प्रकाशित भी हो चुकी है। हाल ही में कुछ पीड़ित पालकों ने हमे बताया कि अब तो प्रभावी पुस्तक माफिया बेख़ौफ  कहता फिर रहा है कि कितनी भी खबरें प्रकाशित हो जाय,मुझे कोई फर्क नही पड़ता है। मैं हर साल नियमित मिठाई संबंधित विभाग को जो पहुँचा देता हूँ। इसलिए तो वे मेरी दुकान पर जाँच या छापा डालने के लिए आ ही नहीं सकते हैं। मातृ शक्ति कलेक्टर से अंतत: बेचारे लाचार पालकों की लूट के चंगुल से मुक्ति पाने की आखिरी आस भी शायद टूट गयी। शायद,लाचार और परेशान अभिभावकों को पुस्तक और स्कूल माफियाओं के चंगुल से मातृ शक्ति कलेक्टर आजाद नही करवा पायी ? प्रशासन यदि पूरी ईमानदारी और दृढ़ इक्षा शक्ति से प्रकाशित खबरो को पढ़कर सिर्फ  उपरोक्त माफिया को ही दबोच लेते,तो अपने आप जिले के शेष छोटे मोटे पुस्तक एवं स्कूल माफिया पक्का भूमिगत हो जोते, और पालक इनके शिकंजे से मुक्त भी हो जाते,ऐसा हमारा मानना है।

हर स्कूल की अपनी एक निर्धारित दुकान

2015 में लोक शिक्षण संचालनालय भोपाल ने आदेश दिया था कि एनसीईआरटी की किताबों के अलावा निजी स्कूल अधिकतम 4 किताबें ही चला सकते हैं। इसके बावजूद कई स्कूल 4 से ज्यादा किताबें चला रहे हैं। इनकी कीमत 150 से 500 रुपए तक होती है। जिले में 20से 30 की संख्या में बड़ी निजी स्कूलें संचालित हैं। सभी स्कूलों ने किताबों के लिए दुकानें निर्धारित कर रखी हैं। निर्धारित दुकानों में ही उस स्कूल की किताबें मिलती हैं। एक ही दुकान निर्धारित होने से पुस्तक विक्रेता अभिभावकों को छूट भी नहीं देते, जिससे उन्हें मजबूरन निर्धारित रेट पर पुस्तकें खरीदन पड़ता हैं। एनसीईआरटी की किताबें सस्ती होती हैं। लेकिन जब अभिभावकों को ये नहीं मिलती, तो वे मजबूरी में उन्हीं दुकानों से किताबें खरीदते हैं,जहां से पहले भी खरीदते आए हैं।

दबदबा रहता है स्कूल संचालकों का

कुछ निजी स्कूल ऐसी है, जिनकी किताबें बाजार में नहीं मिलती। किताबे क्या यूनिफार्म तक उनकी शर्तों के अनुरूप ही खरीदना पड़ते हैं। इस तरह का खेल लंबे समय से चल रहा है,क्योंकि विभागीय अफसरों पर स्कूल संचालकों का दबदबा रहता है। जिसका खामियाजा लोगों को उठाना पड़ता  है। सूची जारी नहीं होने से पालक दुकानों पर भटकते रहते   हैं।

चला रहे,मनमानी तरीके से निजी प्रकाशकों की किताबें

निजी स्कूल मनमानी तरीके से निजी प्रकाशकों की किताबें चला रहे थे। शहर की हर स्कूल का यही हाल है,कक्षा 4 थी एवं 5 वीं की किताबें 3 से 4 हजार में मिल रही थी,इसके बावजूद भी जिला प्रशासन ने कोई कार्रवाई नहीं की।

रामेश्वर सोलंकी- अभिभावक

प्रशासन सख्त हो तो ही,खत्म हो सकेगी निजी स्कूलों की मनमानी

यह समस्या हर साल की है। अच्छा कमीशन पाने के लिए निजी स्कूल निजी प्रकाशकों के महंगे पाठ्यक्रम अभिभावकों से खरीदवाते हैं। प्रशासन को चाहिए कि इस मोनोपोली को खत्म करने के लिए सख्ती से कदम उठाए जाएं। यदि 5-5 दुकानों के नाम विद्यालय के सूचना पटल पर स्वच्छ एवं स्पष्ट रूप से चस्पा करने का आदेश थे तो उसका  सख्ती से पालन कराना भी जिला शिक्षा अधिकारी की जिम्मेदारी तो थ़ी।

जितेंद्र सिंह राठौर- रहवासी-झाबुआ