बहुत ही नाइंसाफी है......!-एलिवेटेड रोटरी वाले फ्लाईओवर पर काम नहीं,वाहन हो गए 33 लाख, ट्रैफिक पुलिस अमला 650 का
इंदौर रिंग रोड,बाईपास से आने-जाने वाले वाहनों पर नियंत्रण के लिए भी ट्रैफिक अमला है जरूरी-मंत्रियों को शायद अहम-हमारे क्या औचित्य रह जायेगा?
झाबुआ/इंदौर। संजय जैन-सह संपादक। शहर इंदौर में ना तो कायदे की पार्किंग है,ना ही ट्रैफिक जवान पर्याप्त हैं। बावजूद इसके मजेदार बात तो यह कि अब इंदौर को ट्रैफिक में भी नंबर वन बनाना है। बढ़ते अपराधों पर नियंत्रण ना होने पर वरिष्ठ अधिकारियों का रटा-रटाया जवाब रहता है। हर आदमी के पीछे एक जवान भी लगा दें,तो भी अपराध नहीं रोके जा सकते है,यही हाल ट्रैफिक सुधार को लेकर भी है। आए दिन होने वाली प्रशासनिक बैठकों में,यातायात सुधार संबंधी रैलियों,संगोष्ठी में यातायात में इंदौर को नंबर वन बनाने की शपथ दिलाने वाले चाहे महापौर पुष्यमित्र भार्गव,कद्दावर मंत्री हों या प्रशासनिक अधिकारी ही हों,जिन्हें शायद ही इस बात की जानकारी नहीं है कि 35 लाख से अधिक आबादी वाले इंदौर शहर में 33 लाख वाहनों के ट्रैफिक को संभालने के लिए मात्र 650 जवानों का अमला ही है।
मांग क्यो करे और क्यो वक्त भी जाया करें?
कहने को तो मुख्यमंत्री डॉ.मोहन यादव इंदौर के प्रभारी हैं,लेकिन देखा जाय तो ट्रैफिक और पुलिस अमले की कमी जैसी इंदौर में है,वैसी ही प्रदेश के अन्य जिलों में भी है। उल्लेखनीय है कि सीएम खुद प्रभारी है। सांसद से लेकर विधायक तक इसलिए बेफिक्र हैं कि सीएम को तो सारे हालात पता ही हैं,तो फिर हम उन्हें यह याद दिलाकर, पुलिस,ट्रैफिक अमले में वृद्धि की मांग क्यो करें और क्यो वक्त भी जाया करें.?
एक से डेढ़ हजार जवानों के स्टॉफ की है दरकार.
इंदौर शहर का ट्रैफिक सम्हालने के लिए कुछ महीनों पहले तक 700 जवानों का स्टॉफ था,इनमें से करीब 50 सेवानिवृत्त हो चुके हैं। रिक्त हुए इन पदों पर आज तक नियुक्ति नहीं हुई है। शहर का यातायात प्रमुख 50 चौराहों पर नियंत्रित करना होता है। ज्यादातर चौराहे में कुछ तो चार रास्ते और कुछ तो छह रास्तों वाले हैं। शहर का ट्रैफिक व्यवस्थित रहे, इसके लिए कम से कम एक से डेढ़ हजार जवानों का स्टॉफ तो चाहिए ही,ऐसा हमारा मानना है।
चौराहे पर कम से कम चार जवानों की तैनाती बेहद जरूरी है
शहर के बाहरी हिस्से रिंग रोड और बायपास से होकर जाने वाले वाहनों की संख्या तो इन तैंतीस लाख वाहनों में शामिल ही नहीं है। शहर के हर चौराहे पर कम से कम चार जवानों की तैनाती बेहद जरूरी है,यानी दो शिफ्ट में इन जवानों की संख्या 8 भी करना पड़ेगी। गौरतलब है कि अभी जितना स्टॉफ है,उन जवानों में से भी सारे तो मैदानी ड्यूटी कर ही नहीं रहे हैं। इनमें से कुछ तो बड़े अधिकारियों की गाड़ी पर और ऑफिस में भी पदस्थ हैं।
शहर के 30 से अधिक चौराहों पर ही कैमरे लगे हुए
बेहतर यातायात और चालानी कार्रवाई के लिए फिलहाल इंदौर शहर के 30 से अधिक चौराहों पर ही कैमरे लगे हुए हैं। इन कैमरों में वो वाहन चालक कैद होते रहते हैं,जो हेलमेट नहीं पहने हों या रेड लाइट का पालन नहीं कर रहे हों। कैमरे भी उन्हीं वाहन चालकों को कैद करते हैं,जो उसकी फ्रेम में आ जाएं। बाकी रांग साइड,लेफ्ट टर्न का उल्लंघन करने, रेड सिग्नल रहते वाहन निकालने,एक साइड का ट्रैफिक बंद होने से पहले ही अगल-बगल से दोपहिया,चार पहिया वाहन रफ्तार से निकालने वालों के कारण भी कई वाहन चालक बेमतलब कैमरों में चालानी कार्रवाई के शिकार होते रहते हैं।
फ्लाय ओवर निर्माण की दिशा में काम करना होगा
शहर सफाई के मामले में सुपर से भी ऊपर पहुंच चुका है, इस उपलब्धि की वाहवाही लूटने वाले जनप्रतिनिधियों के साथ ही पहले की कांग्रेस सरकार और आज की भाजपा सरकार ने चिंतन ही नहीं हैं किया कि शहर के विकास की भूख जितनी तेजी से बढ़ी है,उसी गति से तनावमुक्त ट्रैफिक के लिए हैदराबाद की तर्ज पर 30-35 किलोमीटर लंबाई वाले फ्लाय ओवर निर्माण की दिशा में काम किया जाना चाहिए। उल्लखनीय है कि केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी के शहर नागपुर से भी अधिकाधिक फ्लाय ओवर वाला मॉडल अपनाने पर चिंतन तक नहीं हुआ है।
मंत्रियों को शायद अहम-हमारे क्या औचित्य रह जायेगा?
इंदौर उत्थान अभियान समिति ने मंत्री कैलाश विजयवर्गीय से लेकर मुख्यमंत्री तक को आधुनिक प्लानिंग के अंतर्गत पृथक-पृथक फ्लाईओवर के बदले एलिवेटेड रोटरी वाले फ्लाईओवर को भविष्य की जरूरत बताया है। प्रेजेंटेशन भी दिए हैं,लेकिन मंत्रियों को शायद अहम है कि योजनाएं आप के सुझाव से ही बनने लगी,तो हमारे होने का क्या औचित्य रह जायेगा?
प्रदेश का सबसे महंगा ब्रिज
अभी शहर में 11 फ्लाईओवर का काम चल रहा है। 2 फ्लाई ओवर के टेंडर होना बाकी है। 3 विभाग मिलकर इन 13 फ्लाई ओवर ब्रिज का निर्माण करेंगे। 858.79 करोड़ रुपए की लागत से बनने वाले इन फ्लाई ओवर से,दो सालों में शहर का ट्रैफिक लोड कितना कम होगा...? यह तो आगे आना वाला वक्त ही बताएगा.....क्योंकि इन दो सालों में वाहनों की संख्या का बढ़ना भी तय है। लोक निर्माण विभाग 6 रेलवे ओवर ब्रिज-आरओबी का निर्माण कर रहा है,जो 2025 से 2026 तक पूरे हो जाएंगे। इसी तरह आईडीए भी 3 ब्रिज बना रहा है। इसमें शहर के लव कुश चौराहे पर दो ऐसे ब्रिज हैं,जिसमें से एक ब्रिज आने और दूसरा ब्रिज जाने के लिए रहेगा। इन दोनों ब्रिज के बीच से मेट्रो गुजरेगी। आपको बता दे कि यह प्रदेश का सबसे महंगा ब्रिज भी है। इन दो विभागों की तरह ही एमपीआरडीसी भी 4 फ्लाई ओवर ब्रिज का निर्माण कर रहा है।
एलिवेटेड रोटरी वाले फ्लाईओवर क्यों जरूरी?
एलिवेटेड रोटरी वाले फ्लाय ओवर विशेष रूप से तेज़ गति वाले ट्रैफ़िक के लिए बनाए जाते हैं। आमतौर पर कई चौराहों.सीमित प्रवेश या निकास बिंदुओं और विपरीत दिशाओं में जाने वाले ट्रैफ़िक के लिए,लेन के बीच एक डिवाइडर से बचने के लिए ये एलिवेटेड रोटरी वाले फ्लाय ओवर आमतौर पर लंबी दूरी तक फैले होते हैं। फ्लाईओवर एक ऐसी संरचना है जो दो या दो से अधिक बिंदुओं को जोड़ती है। ये एक सुगम मार्गध्मार्गों से अलग होते हैं या एक मानव निर्मित संरचना होती है,जो यातायात को कम करके यात्रा को तेज़ बनाती है। आमतौर पर भारी यातायात से बचने के लिए दो प्रमुख सड़कों के चौराहे पर इसका उपयोग किया जाता है।

