आकाशवाणी के रिकार्डिंग रूम में बहते रहे आंसू सुधा जी के, बज रहा था यह गीत, रहे ना रहे हम महका करेंगे
झाबुआ। संजय जैन सह संपादक। पिछले दिनों वरिष्ठ पत्रकार कीर्ति राणा विविध भारती इंदौर (एफएम 101.6) पर लोकप्रिय कार्यक्रम हमारे मेहमान के इंटरव्यू की रिकार्डिंग के लिए गए थे।वहां फांसी वाली खबर की चर्चा के साथ माहौल ऐसा बन गया कि एनाउंसर सुधा शर्मा निःशब्द हो गई थी गीत बज रहा था रहे ना रहे हम, महका करेंगे।
सुधा जी की दिलचस्पी फांसी का किस्सा सुनने में थी
इंटरव्यू तो बमुश्किल आधे घंटे में समाप्त हो गया था । सुधा जी की दिलचस्पी फांसी का किस्सा सुनने में थी। उन्होंने 1996 में सावन के पहले सोमवार को सेंट्रल जेल में उज्जैन की तराना तहसील के गांव लक्ष्मीपुरा के उमाशंकर पांडे को दी गई फांसी का किस्सा सुनाना शुरु कर दिया और टप-टप करते आंसू उनकी आंखों से गिरने लगे थे। वे पर्स से रुमाल निकाल कर जितनी देर आंखें पोंछने में लगातीं, बस उतने पल ही रिकार्डिंग रूम में चुप्पी रही , फिर वो लंबी गहरी सांस लेकर किस्सा सुनने के लिए खुद को तैयार करतीं रही, कहतीं ,हां,भाईसाब आगे बताइये।
आंसू और किस्सा दोनों गड्ड-मड्ड होते जा रहे थे
कभी उनका मुंह फटे का फटा रह जाता तो कभी आश्चर्य से पूछ रही थी कि क्या आपने सच में उसे मरते हुए देखा ? कितनी देर तड़पा वह अच्छा एक सेकंड में खत्म हो गया क्या? वो भी तो इंसान ही था क्या आप को डर नहीं लगा ? क्या उसके परिवार वालों से आप की बात हुई ? क्या पुलिस वालों ने, जेल स्टॉफ ने आप को पहचाना नहीं ? आप की मन:स्थिति क्या रही थी जब आप वापस घर पहुंचे थे? क्या आप को ठीक से नींद आ गई ? अभी जब भी फांसी वाली बात याद आती है तो आपको कैसा लगता है ? जब भाभीजी को आपने बताया तो उनका क्या रिएक्शन था ? भास्कर में खबर छपी तो क्या हुआ ? सुधा जी के हर सवाल का जवाब देता रहा घड़ी के कांटें दौड़ते जा रहे थे। इंटरव्यू से ज्यादा वक्त तो फांसी के किस्से ने ले लिया था। उनके प्रश्न थे कि खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहे थे। फिर खुद सुधा जी ने ही कहा किसी पॉडकास्ट पर आया है क्या आप का यह इंटरव्यू..? राणा जी फांसी वाली घटना पर एक लंबा इंटरव्यू तो मैं ही करूंगी।

