इस फैक्ट्री में तैयार होते हैं स्वच्छता में अव्वल आने के नंबर...
एशिया का सबसे बड़ा बायो-सीएनजी प्लांट-2.25 करोड़ की कमाई हो रही, निगम को....
झाबुआ/इंदौर।संजय जैन-सह संपादक। स्वच्छ सर्वेक्षण में सतत आठ बार नंबर वन आने पर इंदौर के निवासियों को यह जानकर अच्छा लगेगा कि देश के सारे शहरों को पछाड़ने वाले इंदौर को लगातार शिखर पर रखने वाले नंबर करीब साढ़े दस किलोमीटर दूर स्थित एक चारदिवारी में तैयार होते हैं।
2.25 करोड़ की कमाई हो रही हैं निगम को....
महापौर इंदौर पुष्यमित्र भार्गव ने इस बार भी सफाई मित्रों के साथ शहर के नागरिकों को ही श्रेय दिया है, लेकिन अधिकांश नागरिकों के साथ रीलबाज युवाओं को भी पता नहीं है कि देवगुराड़िया स्थित सीएनजी प्लांट में सतत आठ साल से ये नंबर तैयार तो हो ही रहे हैं साथ ही यह प्लांट हर साल करीब 2.25 करोड़ की कमाई भी निगम के खजाने में जमा करा रहा है।
चौबीस घंटे वातावरण में उड़ने वाली बदबू के हाथ-पैर भी बांध दिए...
जब पहली बार इंदौर देश में नंबर वन बना था,तब कई लोगों को यह लगा था कि ये सब सेटिंग का खेल है। तत्कालीन कलेक्टर मनीष सिंह की दूरदृष्टि का ही नतीजा था कि देवगुराड़िया में 15 एकड़ जमीन पर 150 करोड़ की लागत वाला बायो सीएनजी प्लांट स्थापित किया गया था। इस प्लांट का पीएम मोदी ने वर्चुअल शुभारंभ भी किया था। इस बायो सीएनजी प्लांट वाली योजना को मूर्त रूप देकर इंदौर तत्कालीन कलेक्टर मनीष सिंह ने चौबीस घंटे वातावरण में उड़ने वाली बदबू के हाथ-पैर भी बांध दिए थे।2022 के पहले यहां दिल्ली की तरह कचरे के पहाड़ वाले इस मार्ग से गुजरने वालों के साथ सैकड़ों गांवों के रहवासियों भी इसकी सड़ांध और मच्छरों की भरमार से त्रस्त थे।
एशिया का सबसे बड़ा बायो-सीएनजी प्लांट...
इन पांच सालों में गीले-सूखे कचरे के निस्तारण के लिए स्थापित किए गए दो प्लांट ने न सिर्फ इलाके को राहत दी है बल्कि विकसित हुई कॉलोनियों में जमीन के भाव भी बढ़ा दिए हैं।आठवीं बार मिले अवार्ड ने यह भी बता दिया है कि यदि एशिया का यह सबसे बड़ा देवगुराड़िया स्थित बायो सीएनजी प्लांट नहीं होता तो इंदौर सुपर स्वच्छ लीग में हीरो भी नहीं बन पाता।
रोज औसतन 700 टन गीला कचरा और 400 टन सूखा कचरा निकलता है...
नगर निगम अपर आयुक्त अभिलाष मिश्रा का कहना हैं कि 35 लाख की आबादी वाले इंदौर शहर के 85 वार्डों से हर दिन कचरा गाड़ियों द्वारा गीला-सूखा कचरा दस संग्रहण केंद्रों तक लाया जाता है। यहां से कचरा देवगुराड़िया स्थित गीले- सूखे कचरे के प्लांट पर लाकर वहां कर्मचारियों द्वारा सूखे कचरे की छंटाई की जाती है। गीला कचरा मशीनी प्रक्रिया से स्लरी में बदला जाता है। हमने 15 एकड़ जमीन,प्लांट को बीस साल के लिये लीज पर दी है। हमें हर दिन 550 मैट्रिक टन कचरा उपलब्ध कराना रहता है। इस ग्रुप ने 150 करोड़ रु.खर्च कर प्लांट लगाया है और हमें अब हर साल 2.25 करोड़ प्राप्त हो रहे हैं। 35 लाख की आबादी वाले इंदौर में हर रोज औसतन 700 टन गीला कचरा और 400 टन सूखा कचरा निकलता है।
कचरे से ऐसे बनती है गैस...
शहर के 10 संग्रहण केंद्रों से गीले-सूखे कचरे को प्लांट में लाया जाता है जहा इस जैविक कूड़े को डीप बंकर में लोड कर देते हैं म,फिर वहां से ग्रैब क्रेन से उठाकर प्री-ट्रीटमेंट एरिया में लाते हैं, यहां मिलिंग होती है, स्लरी में कंवर्ट करते हैं, ये तकनीक डेनमार्क से आई है, जो ऑटोमैटिक कंवर्ट हो जाता है।स्लरी को डायजर्स में डाइजेस्ट करते हैं और 20-25 दिन तक उससे बायोगैस बनाते हैं, फिर बायोगैस को स्टोरेज एरिया में ले जाते हैं, जिसमें मीथेन 55-60 होता है, फिर उसे गैस क्लीनिंग और अपग्रेडेशन में ले जाते हैं।

