कचरे से खाद बनता देख चकित हो गए गांधीजी...आज वही ग्रीन वेस्ट बना हुआ है,नगर निगम के लिए राजस्व वृद्धि में सहायक भी...
झाबुआ/ इंदौर ।संजय जैन-सह संपादक। जिन अंग्रेजों के ज्ञान की दुहाई देते हम नहीं थकते, कौन विश्वास करेगा कि उन्हें बिहार और इंदौर क्षेत्र के अनपढ़ किसानों ने कंपोस्ट खाद बनाने का ज्ञान भी दिया था....? इसी कारण पूरे विश्व में इंदौर कंपोस्ट सिस्टम को पहचान मिली और गांधीजी भी इसका अध्ययन करने इंदौर आए थे। उसी सिस्टम को अपनाकर नगर निगम ने शहर के उद्यानों के एक हिस्से में कचरे से खाद बनाने के लिए वार्डों के रहवासियों को प्रेरित किया है। नगर निगम ने ग्रीन वेस्ट का प्लांट स्थापित किया और खाद-गैस की बिक्री से नगर निगम के राजस्व में वृद्धि का सिलसिला भी शुरु हुआ।
बेहद ताज्जुब हुआ...
सन 1905 में कपास की जाति विकसित करने के लिए डॉ.अल्बर्ट हॉवर्ड भारत आए थे, ब्रिटिश हुकूमत कपास की पैदावार बढ़ाने के लिए रासायनिक खाद को जरूरी मानती थी। अल्बर्ट जब बिहार के गांवों-खेतों में घूमे तो उन्हें लहलहाती हरीभरी फसलें देख कर बेहद ताज्जुब हुआ था। उन्होंने किसानों से खाद की जानकारी ली थी तो जवाब मिला घूड़े पर गोबर, वृक्षों के पत्ते और अन्य कचरा इकट्ठा करते रहते हैं, वह सड़ता रहता है, इसे ही वे खाद के रूप में डालते हैं । अल्बर्ट को रासायनिक खाद का उपयोग बेमानी लगा था,उन्हें जानकारी भी मिली थी कि कंपोस्ट खाद की दिशा में इंदौर में और बेहतर काम हो रहा है।
इंदौर कंपोस्ट सिस्टम का नाम मिला था...
जैविक खेती के प्रमोटर-कृषि वैज्ञानिक अरुण डिके बताते हैं कि अल्बर्ट और उनकी पत्नी ग्रेवियल ने देश में घूम घूम कर कंपोस्ट खाद से की जा रही खेती को समझा था। वे इस खेती को वैज्ञानिक जामा पहनाने के लिए तत्कालीन महाराजा तुकोजीराव से भी मिले थे।तुकोजीराव ने उन्हें 300 एकड़ जमीन लीज पर दी थी ताकि वह कंपोस्ट खाद आधारित फसल का अनुसंधान कर सकें। अनपढ़ किसानों से मिले ज्ञान के बाद कंपोस्ट खाद को लेकर उनके प्रयोगों से इंदौर कंपोस्ट सिस्टम का नाम मिला था।
भारत में इंदौर की पहचान बनी...
जब 1932 में लंदन में हुए तीसरे गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने गाँधीजी पहुंचे थे तब उन्होंने वहां एक कृषि मेले का उद्घाटन किया था। मेला भ्रमण के दौरान उनकी नजर एक स्टॉल पर पड़ी थी, जिसमें भारत का नक्शा था, लेकिन तख्ती इंदौर की टंगी हुई थी। उन्हें तब बताया गया था कि इंदौर कंपोस्ट सिस्टम के कारण भारत में इंदौर की पहचान बनी है। इंस्टीट्यूट ऑफ प्लांट इंडस्ट्री द्वारा स्थापित कॉलेज के प्लांट में खाद बनाने के लिए कई प्रयोग किए जा रहे थे। यह देख बापू चकित रह गए थे तब उन्होंने देशभर में इंदौर का जिक्र किया था। कृषि कॉलेज में गांधीजी की इंदौर यात्रा की वो तस्वीरें आज भी देखी जा सकती हैं।
इंदौर जैसा समझदार किसान विश्व में और कहीं का भी नहीं... गाँधीजी....
गांधीवादी चिन्मय मिश्र "का कहना है कि होल्कर रियासत के वक्त गांधी जी को आमंत्रित इसलिए किया गया था कि बेहतर खेती के लिए वे सुझाव देंगे, किंतु गांधीजी तो इंदौर का कंपोस्ट सिस्टम समझ कर चकित रह गए थे।तब गांधीजी ने कहा था इंदौर का भारतीय किसान जैसा समझदार विश्व में और कहीं का भी नहीं है।
इंदौर विधि कहा जाता था...
1925 में अंग्रेज अधिकारी अलबर्ट हावर्ट ने इंदौर इंस्टिट्यूट ऑफ प्लांट इंडस्ट्री में जैविक खाद पर शोध कर इंदौर कम्पोस्ट सिस्टम बनाया था,जिसे फिर विश्व के कई देशों ने भी अपनाया। इस विधि को इंदौर विधि कहा जाता था। महात्मा गांधी जब इंदौर (1935 में) आए थे तो इस सिस्टम को समझने के लिए विशेष तौर पर डेली कॉलेज के पास (पीटीसी के सामने) स्थित इंदौर इंस्टिट्यूट ऑफ प्लांट इंडस्ट्री गए थे।
नगर निगम इंदौर ने भी अपनाया कंपोस्ट सिस्टम.....
अब विश्व में प्रसिद्ध रहे इंदौर कंपोस्ट सिस्टम को महापौर पुष्यमित्र भार्गव ने नगर निगम के 85 वार्डों के उद्यानों मे भी लागू करने का प्लान बनाया है। इन उद्यानों के एक कोने में गहरे गड्डे में गोबर-गौमूत्र, पेड़ों की पत्तियां आदि डाल कर फिर इसे सड़ा कर कंपोस्ट खाद बना कर इसे प्लांट में भेजा जा रहा है। इसी सड़े हुए कचरे (ग्रीन वेस्ट) से गैस एवं खाद बनाकर विक्रय भी की जा रही है।
सौ साल पहले ऐसे बनता था खाद..
बीते कुछ दशक से फसलों को जल्दी तैयार करने और एक साल में तीन-चार फसलें लेने के लिए रासायनिक उवर्रक के प्रति आकर्षण बढ़ा है,लेकिन ऐसी खाद के अत्याधिक उपयोग से खेत की मिट्टी की उर्वरा शक्ति घटते जाने के साथ ही फसलों में जहरीले तत्व बढ़ने से बीमारियां भी बढ़ने लगी हैं। सौ साल पहले इंदौर में किसान जिस इंदौर कंपोस्ट सिस्टम का लाभ फसलों की गुणवत्ता के लिए लेते थे, तब वह खाद फसलों के अवशेष को सुखा कर उसे पीस कर पावडर बनाकर उसमें गोबर-गौमूत्र मिलाकर फसलों के लिए उपयोग किया करते थे।

