बच्चे ने कलेक्टर से भावुक होकर की अपील

स्कूल में यदि हादसा हुआ तो कौन होगा जिम्मेदार? 

झाबुआ।संजय जैन-सह- संपादक। आदिवासी अंचल जिले में शिक्षा विभाग के हाल बेहद ही बेहाल हैं। गौरतलब है कि प्रशाशन के जिम्मेदारों ने लगभग जर्जर पुराने भवन तो गिरा दिए है, लेकिन अब तक उसके बदले नए भवन स्वीकृत नहीं हुए है। जिस कारण अब स्कूले किराए के भवनों में संचालित की जा रही और तो कही बच्चे स्कूल के बाहर सड़क पर बैठकर पढ़ाई करने को मजबूर हो रहे हैं। उल्लखनीय है कि यदि शिक्षा विभाग के पास नवीन भवन बनाने का बजट नहीं था,तो ऐसे में भवनों की मरम्मत तो करवाई जा सकती थी या फिर उचित व्यवस्था पहले से कर लेनी थी। 

स्कूल भवन अपनी दुर्दशा पर आंसू बहा रहा

जनपद पंचायत झाबुआ के गांव लोहारिया का स्कूल भवन अपनी दुर्दशा पर आंसू बहा रहा है,जिस पर जिम्मेदारों का ध्यान ही नही है। आये दिन जर्जर स्कूलों की स्थिति पर खबर मय फ़ोटो लगातार प्रकाशित भी हो रही है।उपरोक्त स्कूल के भवन की हालात बुरी तरह से खस्ता हो चुकी है। यहा  नन्हे मुन्ने बच्चे मजबूर होकर स्कूल के जर्जर भवन के बाहर खुले आसमान के नीचे कर गीले में पढ़ाई कर रहे है।

दहशत के माहौल में अपनी पढ़ाई पर ध्यान कैसे दे पाएंगे?

विश्वनीय सूत्रों से प्राप्त जानकारी नुसार जिले में लगभग 150 भवन  प्रशाशन द्वारा गिराए जा चुके हे। अब ऐसे में यह नन्हे मुन्ने बच्चे अपनी जान हथेली पर रखकर दहशत के इस माहौल में अपनी पढ़ाई पर ध्यान कैसे दे पाएंगे...?जो एक गहरी चिंता का विषय है। जिले के गांव लोहारिया में कुछ ऐसा ही हमे देखने को मिला है  जहाँ नन्हे मुन्ने बच्चे
खुले आसमान के नीचे भरी बरसात में  पढ़ाई करने को मजबूर और लाचार हैं,जिनकी व्यथा समझने वाला कोई नही है क्या...?*

संघर्ष से सिद्धि की टीम द्वारा जमीनी हकीकत की पड़ताल

संघर्ष से सिद्धि की टीम झाबुआ के लोहारिया गांव स्कूल में जमीनी हकीकत देखने पहुंची,जहां की प्राथमिक शाला में लगभग 120 बच्चे अध्यनरत है। यहाँ हमने देखा कि सभी नन्हे मुन्ने बच्चे स्कूल के बाहर सड़क पर बैठकर पढ़ाई कर रहे थे। स्कूल के टीचर से बात की तो उन्होंने नाम न छापने की शर्त पर हमें बताया कि उन्होंने उस बारे में लिखित में बड़े अधिकारी को कई बार अवगत करा भी दिया है, बावजूद इसके आज तक बच्चो को दूसरी जगह बैठने की व्यवस्था नहीं की गयी। बच्चो के माता पिता से जब हमने चर्चा की तो उनका कहना था की हमारे छोटे-छोटे बच्चे स्कूल आते हे, परंतु हमारे मन मे हमेशा डर रहता है कि कही हमारे बच्चे हादसे का शिकार न हो जाए। स्कूल पूरी जर्जर हो चुकी हैं ऐसे में हमारे बच्चे बाहर बैठकर पढ़ाई करने हेतु मजबूर है। वे अभी बरसात में और आगे ठंड और भीषण गर्मी में इस दहशत भरे माहौल में पढ़ाई करेंगे तो वे अपनी पढ़ाई पर अपना ध्यान कैसे दे पाएंगे

मातृशक्ति कलेक्टर से गुहार लगायी बच्चे ने

स्कूल के एक बच्चे ने तो हमारे समक्ष मातृशक्ति कलेक्टर से गुहार लगाते हुए कहा कि मेडम हमारी स्कूल बनवा दीजिए। इस स्कूल में कभी हादसा हुआ तो हमारी जान भी जा सकती हे। अब तो आगे यह देखना कि इस मासूम की गुहार को पढ़कर मातृशक्ति कलेक्टर और जिम्मेदारों का मन पसीजता है या नहीं?खैर, नन्हे मुन्ने बच्चे आज तो यह सत्य है कि ऐसे दहशत के माहौल में बच्चे पढ़ रहे हे। 

सिर्फ स्कूल चले हम नारे का आलाप ही रागती

एक ओर तो सरकार जोर शोर से  स्कूल चले हम नारे का आलाप रागती है वही दूसरी ओर इन नन्हे मुन्ने बच्चों का भविष्य खुले में सड़कों पर पढ़ने हेतु मजबूर करती हुई दाँव पर लगा कर कहीं कुम्भकर्णीय निंद्रा में तो नही सो गई है? ऐसे में फिर कैसे शिक्षा का स्तर बढ़ पायेगा,यह तो जिम्मेदार ही जाने?

दरकार है सिर्फ वातानुकूलित कक्ष से बाहर निकलकर जमीनी हकीकत देखने की

देखा जाय तो इस उपरोक्त मामले में तो समन्वय अधिकारी से लेकर ब्लाक लेवल के सभी बड़े अधिकारियों की बड़ी अक्षम्य लापरवाही साफ सामने दिख रही है। जिम्मेदारो को अपने वातानुकूलित कक्ष से पूरी दृढ़ संकल्प के साथ बाहर निकलकर जमीन पर उतारना होगा,ऐसा हमारा मानना है। क्या जिम्मेदारों को मजबूर इन मासूम बच्चों की पीड़ा नजर नही आ रही है? क्या हर बार की तरह इस बार भी गंभीर प्रशासन सिर्फ दिखावे हेतु बड़े जिम्मेदारो को छोड़कर सिर्फ अदने से कर्मचारी को निशाना बनाकर दोबरा अपने वातानुकूलित कक्ष में नही चले जायेंगे?या इस बार बड़े जिम्मेदारों पर सख्त कार्यवाही करेगा? यह तो आगे आने वाला वक्त ही बता पायेगा